10 जनवरी 2019 को राष्ट्रपति ने बाल निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार (संशोधन) अधिनियम 2019 को मंजूरी दे दी ।
इस अधिनियम में मुख्य रुप से विद्यालयों में अपनाई जा रही फेल न करने की नीति अर्थात "नो डिटेंशन पॉलिसी" को समाप्त किया गया है।
उल्लेखनीय है कि बाल निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार (संशोधन) अधिनियम 2019 को संसद ने 03 जनवरी 2019 को ही पारित कर दिया था ।
मुख्य बिंदु-------
इस विधेयक द्वारा स्कूलों में नो डिटेंशन नीति को समाप्त करने के लिए शिक्षा का अधिकार (Right to Education Act- RTE) अधिनियम में संशोधन किया जाएगा। अधिनियम के वर्तमान प्रावधानों के तहत प्राथमिक विद्यालय (Classes 1-8) की पढ़ाई पूरी करने तक किसी भी बच्चे को फेल नहीं किया जाएगा और उन्हे अगले क्लास में जाने से रोका नहीं जाएगा।
संशोधन के अनुसार, यह राज्यों को तय करने के लिए छोड़ दिया गया है कि "नो-डिटेंशन पॉलिसी" को जारी रखें या बंद कर दे।
अधिनियम में यह प्रावधान है कि कक्षा 5 और 8 में प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष के अंत में नियमित ढंग से परीक्षा आयोजित की जाएगी।
यदि कोई परीक्षाओं में फेल कर जाता है तो उसे अतिरिक्त पढ़ाई कराई जाएगी और परिणाम निकलने के 2 महीने के अंदर एक नई परीक्षा ली जाएगी। यदि छात्र/छात्राएं फिर भी फेल हो गए तो उसको उसी कक्षा में रोक दिया जाएगा। 'नो-डिटेंशन पॉलिसी' के अनुसार 'स्कूल में दाखिल किसी भी बच्चे को 1 वर्ष पश्चात वापस उसी कक्षा में नहीं रखा जाएगा'।
इसके तहत कक्षा 8 तक प्रत्येक बच्चे हर वर्ष अगली कक्षा में स्वतः ही चले जाएंगे। परीक्षा के बजाय स्कूलों को प्रत्येक बच्चे के लिए सतत और व्यापक मूल्यांकन (CCE) आयोजित करना चाहिए।
शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति तैयार करने के लिए टीएसआर सुब्रमण्यम समिति ने भी यह सुझाव दिया है कि कक्षा पांचवीं के बाद "नो डिटेंशन पॉलिसी" को बंद कर दिया जाना चाहिए।
इसके अलावा सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन की एक उप-समिति ने भी इस मुद्दे का बरीकी से अध्ययन किया और 'नो डिटेंशन पॉलिसी' को समाप्त करने की सिफारिश की।
(जीकेफैक्ट)
वर्ष 2009 में बने राइट टू एजुकेशन एक्ट को 1 अप्रैल 2010 को देश भर में लागू किया गया था, जिसके तहत 6 से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य रुप से निःशुल्क शिक्षा मुहैया कराने का प्रावधान किया गया है। साथ ही 8वीं तक उसे किसी भी क्लास में फेल नहीं किया जाए।