शक्ति का विकेंद्रीकरण विभिन्न हाथों में विभिन्न स्तर पर शक्ति के वितरण को संबोधित करती है। भारत जैसे विविध समाज में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की व्यवस्था को हर किसी की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने की व्यवस्था के रूप में देखा जा सकता है। यह ना सिर्फ यह सुनिश्चित करती है कि लोग अपने राज नैतिक जिम्मेदारियों को पूरा कर सके बल्कि ये यह भी सुनिश्चित करती है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों को भी प्राप्त कर सकें। यह संसाधनों के उचित वितरण को भी सुनिश्चित करती है। यह जागरूकता सुनिश्चित करने के लिए एक उपकरण भी है। शक्ति का अति केंद्रीकरण भ्रष्टाचार को जन्म देती है। विकेंद्रीकरण शक्ति के संतुलन को बढ़ावा देती है।
प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान सरकार ने सामुदायिक विकास योजना प्रारंभ की। यह भी समय किसी भी देश द्वारा लागू किए गए कल्याणकारी योजनाओं की तुलना में ज्यादा व्यापक थी। लेकिन यह योजना व्यापक रूप से असफल रही। इस योजना के सफलताओं के कारणों को समझने के लिए सरकार ने बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया।इस समिति ने इस योजना एवं इसके पृष्ठभूमि का अध्ययन किया एवं यह निष्कर्ष निकाला की योजना के प्रावधानों में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं थी। यह योजना असफल मुख्यत: राजनीतिक भागीदारी के अभाव के कारण हुई जो कि निम्न स्तर पर राजनीतिक भागीदारी अनुपस्थिति योजना में लोगों की भागीदारी एवं योजना के प्रति लोगों की जानकारी कम रही।समिति ने सुझाव दिया कि लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पंचायती राज व्यवस्था हेतु लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण अनिवार्य है, परंतु एक के बाद एक सरकार परिवर्तित होती रही, लेकिन इन सुझावों को प्रभावशाली बनाया नहीं जा सका।