भारत के संविधान में पंचायती राज व्यवस्था राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का हिस्सा रहे।इसे प्रभावशाली ना बनाने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह था कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने यह माना कि भारत में पंचायती राज व्यवस्था अपने प्राथमिक उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पाएगी। उनका यह मानना था कि ग्रामीण भारत अब तक परिपक्व को नहीं हो सका है।पंचायती राज व्यवस्था के विरुद्ध नहीं थे परंतु उनका यह मानना था कि इसके लिए अभी समय अनुकूल नहीं है। स्थानीय स्तर पर सशक्तिकरण एवं जाति का वर्चस्व शोषित जाति के शोषण को और बढ़ावा देंगे।इससे भिन्न महात्मा गांधी का यह मानना था कि पंचायती राज व्यवस्था के रूप में स्थानीय सरकार के माध्यम से गांवों को और ज्यादा निर्भर बनाया जा सकेगा।
आजादी के उपरांत ना तो केंद्र सरकार एवं नाही राज्य सरकार अपने प्राधिकार के परित्याग के लिए तैयार थे। 1977 में जनता सरकार ने अशोक मेहता समिति के गठन के माध्यम से इस संदर्भ में राजनीतिक इच्छा शक्ति को दर्शाया परंतु सत्ता परिवर्तन ने इस प्रक्रिया को पुनः प्रभावित किया। अंतत: 1992 में भारतीय संविधान के 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस व्यवस्था को प्रभावशाली बनाया गया।पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद भी इसके उद्देश्यों की पूर्ति अब तक नहीं हो पाई है। धन बल एवं बाहुबल का प्रयोग व्यापक रहा है। जाति एवं धर्म आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पित्र सत्ता महिलाओं की भागीदारी को प्रभावित करती है।व्यापक भ्रष्टाचार संसाधनों के उचित वितरण को प्रभावित करता है।