कैप्टन सलारिया का जन्म 29 नवंबर 1935 को शकरगढ़ के जनवल गांव में हुआ था,जो वर्तमान समय में पाकिस्तान में स्थित है। वर्ष 1957 में वे भारतीय सेना की पहली गोरखा राइफल्स में शामिल हुए। नवंबर 1961 में वे संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना की ओर से अफ्रीकी देश कांगो के कांटगा शहर में स्थित एलिजाबेथविले में तैनात थे।
इस दौरान यहां परस्थिति अत्यंत विकट थी, क्योंकि कुछ समय पूर्व ही कांगो बेल्जियम की दासता से मुक्त हुआ था, किंतु वहां बेल्जियम के व्यापारी आजादी के पश्चात भी दमन कर रहे थे। इस परिस्थिति में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कांगो में तैनात शांति सेना को वहां के निवासियों की रक्षा के लिए विदेशी सैनिकों को कांगो छोड़ने का आदेश दिया।
इस निर्णय से परेशान ईन व्यापारियों ने विद्रोह कर दिया तथा कुछ शांति सैनिकों को अगवा कर लिया। कैप्टन सलारिया को शत्रु द्वारा बाधित किए गए मार्ग को साफ करने की जिम्मेदारी दी गई जो काटगा तथा एलिजाबेथविले को जोड़ता था।
कैप्टन सलारिया में अपने साथियों को नेतृत्व प्रदान करते हुए दिए गए कार्य को पूरा किया तथा विद्रोहियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इस अभियान में स्वयं शहीद हो गए पर संयुक्त राष्ट्र में भी उन्होंने भारतीय वीरता की गाथा लिख दी। इसी वीरता के लिए उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। 5 दिसंबर 1961 को शहादत प्राप्त करने वाले कैप्टन गुरबचन सिंह को 26 जनवरी 1962 को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।