- दण्ड एवं न्याय की व्यवस्था अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही है। आरम्भ से ही अन्याय के विरुध्द संघर्ष किया जाता रहा है। मनु, याज्ञवल्क्य, नारद आदि ऋषि-मुनियों ने भी अपने धर्मशास्त्रों में दण्ड का उल्लेख किया है।
- मनु ने अपनी मनुस्मृति में अपराधी को महापातक, अनुपातक एवं उपपाताक जैसे तीन भागों में विभाजित कर कठोर दण्ड की व्यवस्था की है। उस समय विधि के अभाव में राजा को ही विधि एवं न्याय का स्रोत समझा जाता था। राजा को विधि बनाने, उसे लागू करने एवं उसकी अवहेलना करने पर दण्द देने का पूरा अधिकार था। राजा की आज्ञा का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य था।
- भारत में प्राचीन काल से ही एक सुव्यवस्थित आपराधिक न्याय प्राणली प्रचलित थी जिसका उल्लेख अति प्राचीन धर्म-ग्रंथ मनुस्मृति में मिलता है। मनु ने हमला, चोरी, लूट, मिथ्या साक्ष्य, मानहानि, आपराधिक न्यास-भंग, छल, जारता तथा बलात्कार को अपराध की श्रेणी में माना था। आपराधिक न्याय-निर्णय शासक स्वयं करता था तथा वह इस कार्य में अपनी सहायतार्थ न्यायाधीश (मीमांसक) की नियुक्ति करता था। अभियुक्त से वसूल किया गया अर्थदण्ड अपकारित व्यक्ति को न दे करके राजकोष में जमा कर दिया जाता था।
(क्षमा चाहते है कि अभी संविधान का नोट्स पुरा नही दे पाया हुं लेकिन वादा करता हू की कुछ समय बाद मै पुनः संविधान का नोट्स ले के आउंगा।)