भारतीय दण्ड संहिता : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व वर्तमान स्वरूप (02)

शेष आगे से.....

  • मुगल शासन-काल में भारत में मुस्लिम दण्ड-विधि प्रचलित थी और उसी के अनुसार आपराधिक न्याय-प्रशासन किया जाता था। यह कुरान द्वारा शासित होती थी। इस विधि के सिध्दान्त प्राकृतिक न्याय एवं सामान्य विवेक के अनुरूप नहीं थे। यह विधि अत्यन्त कठोर एवं संकुचित थी। छोटे-छोटे अपराधों के लिए कठोर दण्ड दिया जाता था। उदाहरणार्थ, चोरी के अपराध में हाथ काट लिया जाता था और व्यभिचार के मामले में अभियुक्त को पत्थरों से पीटा जाता था।
  • मुस्लिम दण्ड-विधि भिन्न-भिन्न अपराधों के लिये दिये जाने वाले दण्डों को मुख्यतया चार वर्गों में विभाजित करती थी -
    1. किसा
    2. दिया
    3. हद्द
    4. ताजीर
  • किसा का अर्थ है – ‘अधिकार अर्थात् बदला। जैसे-प्राण के बदले प्राण. अंग-भंग के बदले अंग-भंग आदि। सम्पत्ति सम्बन्धी अपराधों पर यह लागू नही होती थी।
  • दिया का अर्थ है – ‘खून का मूल्य’ अनजाने घायल करने के मामले में एक निश्चित पैमाने पर खून का मूल्य पीड़ित पक्ष को दिया जाता था। पीड़ित पक्ष का वारिस दिया” या किसा’ में से जो भी चाहे दण्ड चुन सकता था।
  • हद्द  का शाब्दिक अर्थ्र है – सीमा’इसके दण्ड कठोर हुआ करते थे। आज के दृष्टिकोण से यह दण्ड जंगली और असभ्य कहे जा सकते हैं। हद्द के अन्तर्गत जिना या अवैध मैथुन के लिये पत्थर मार-मार कर या कोड़े मारकर मार डालने का दण्ड निश्चित था। किसी विवाहिता स्त्री पर व्यभिचार का झूठा दोष लगाने पर अस्सी बेत मारने का दण्ड दिया जाता था।
  • ताजीर का अर्थ है – विवेकाधीन’ साधारण तौर पर दण्ड थे- कारावास, देश निकाला, शारीरिक दण्ड, कान पर घूँसे मारना या अन्य कोई असम्मानजनक बर्ताव करना।

शेष अगले नोट्स में ..

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