भारतीय दण्ड संहिता : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व वर्तमान स्वरूप (03)

क्र्मशः ...

  • मुस्लिम दण्ड विधि अत्यन्त कठोर, पुरातनवादी, निर्दयातापूर्ण एवं कट्टर धार्मिक विचारों से ओत-प्रोत थी।
  • भारत की वर्तमान दण्ड विधि ब्रिटिश दण्ड-विधि पर आधरित है।
  • भारत में ब्रिटिशकालीन दण्ड-विधि का इतिहास सन् 1600 से प्रारम्भ होता है, जबकि यहाँ प्रथम बार ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की गई थी।
  • ब्रिटिश शासन-काल में अनेक चार्टर एवं अधिनियम पारित कर मुस्लिम दण्ड-विधि में सुधार एवं परिवर्तन किये गये। इसमें सन् 1600, 1609, 1661, 1668, 1672, 1683, 1687, 1726, 1783, 1875 आदि के चार्टर एवं अधिनियम मुख्य हैं।
  • आपराधिक न्याय-प्रशासन के क्षेत्र में वारेन हेस्टिंग्स, लार्ड कार्नवालिस, विलियम बैंटिक आदि के महत्वपूर्ण योगदान रहे हैं। इनके समय में जो प्रमुख सुधार किये गये, वे निम्नलिखित हैं –
    1. हत्या एवं सदोष मानव-वध के अपराध का निर्धारण औजार से नहीं अपितु अपराधी के आशय से किया जाने लगा।
    2. अपराध को एक सामाजिक अपकार मानते हुए सरकार द्वारा उसका अभियोजन चलाये जाने की व्यवस्था की गई।
    3. बर्बर एवं कठोर दण्ड-व्यवस्था को समाप्त किया गया। अब एक अंग-विच्छेद के स्थान पर 7 वर्ष के कारावास एवं एकाधिक अंग-विच्छेद के स्थान पर 14 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान किया गया।
    4. जारता, बलात्कार आदि अपराधों में प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों जी गवाही जी आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया और अब परिस्थितिजनन्य साक्ष्य एवं संस्वीकृति के आधार पर दण्ड देने की व्यवस्था की गयी।
    5. अब कोई भी व्यक्ति, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, गवाही दे सकता था। धर्म का भेदभाव अब दूर कर दिया गया।
    6. डकैती के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था की गई। अब इसके लिए 7 वर्ष के कारावास एवं हत्यासहित डकैती के लिए मृत्युदण्ड का प्रावधान किया गया।

शेष अगले नोट्स में ..

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