भारतीय दण्ड संहिता : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व वर्तमान स्वरूप (04)

क्रमशः ...

  • जब भारत में ब्रिटिश साम्राज्य पूर्णरूप से स्थापित हो गया तो अंग्रेज शासको के लिए यह आवश्यक हो गया कि ब्रिटिश भारत के लिए एक निश्चित दण्ड विधि का निर्माण कराये क्योंकि उस समय भारतीय न्याय व्यवस्था स्थानीय दण्ड विधान थे। जहाँ हिन्दू शासकों का रााज्य था वहाँ हिन्दू दण्ड विधि का अनुसरण किया जाता था तथा जहाँ मुस्लिम शासकों का राज्य था वहाँ मुस्लिम विधि के अनुसार दण्ड व्यवस्था संचालित की जाती थीं।
  • भारत में ब्रिटिश शासित प्रदेशो की दण्ड-व्यवस्थाओं में भिन्नता को समाप्त करने तथा सभी जगह एक-समान दण्ड प्रणाली लागू करने के उद्देश्य से लार्ड मैकाले ने सन् 1833 में ब्रिटेन की संसद में इन दण्ड विधानों के सन्हिताकरण का प्रस्ताव पेश किया। मैकाले का मत था कि इन प्रदेशों के भारतीयों के मामले पक्षकारों की स्वीय विधि अर्थात् हिन्दुओं के लिए धर्मशास्त्रों तथा मुसलमानों ले लिए कुरान आधार पर निपटाये जाते थे जिनका निर्वचन यथास्थिति पंडित या काजी द्वारा किया जाता था जो अंग्रेज न्यायाधीश के परामर्शदाता की हैसियत से कार्य करते थे। अतः ऐसी स्थिति में न्यायालयों के निर्णय मनमाने, अविवेकपूर्ण तथा अनभिज्ञता भरे होना स्वाभाविक था क्योंकि अंग्रेज न्यायाधीश भारतीय भाषा, रीति-रिवाजों, धार्मिक नियमों आदि से पूर्णतः अनभिज्ञ होने के कारण मामलों का स्वयं के विवेक से निपटारा नहीं कर पाते थे। उन्हें यह जानना कठिन था कि कौन-सी विधि कहाँ प्रयुक्त की जानी है।

शेष अगले नोट्स में ..

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