भारतीय दण्ड संहिता : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व वर्तमान स्वरूप (05)

क्रमशः ...

  • सन् 1833 के चार्टर द्वारा सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए एक विधायन के सृजन का निर्णय लिया गया। गवर्नर-जनरल की कौंसिल में विधि सदस्य के लिए कार्यालय बनाया गया तथा विधि आयोग की नियुक्ति के लिए नियम बनाये गये।
  • मैकाले के सुझाव से प्रभावित होकर ब्रिटिश संसद ने सन् 1834 में  प्रथम भारतीय विधि आयोग का गठन किया जिसे ब्रिटिश भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लागू दण्ड विधि, न्यायालयों की अधिकार-शक्ति तथा पुलिस व्यवस्था आदि का अध्ययन करने सभी जगह एक-सी दण्ड विधि लागू करने हेतु सुझाव देने का कार्य सौंपा गया ताकि विभिन्न क्षेत्रों की दण्ड व्यवस्था में भिन्नता को समाप्त किया जा सके।
  • भारत के लिए दण्ड-विधि का प्रारूप तैयार करते समय मैकाले ने न केवल इंग्लिश तथा भारतीय विधि पर ध्यान केन्द्रित किया बल्कि इस कार्य में उन्होनें लुसियाना तथा नेपोलियन की दण्ड-सन्हिताओं की सहायता भी ली।

( लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले ब्रिटेन का राजनीतिज्ञ, कवि, इतिहासकार था। निबन्धकार और समीक्षक के रूप मे उसने ब्रिटिश इतिहास पर जमकर लिखा। सन् 1834 से 1838 तक वह भारत की सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर तथा लॉ कमिशन का प्रधान रहा। प्रसिद्ध दंडविधान ग्रंथ "दी इंडियन पीनल कोड" की पांडुलिपि इसी ने तैयार की थी। अंग्रेजी को भारत की सरकारी भाषा तथा शिक्षा का माध्यम और यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान को भारतीय शिक्षा का लक्ष्य बनाने में इसका बड़ा हाथ था।Copy)

शेष अगले नोट्स में ..

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