भारतीय दण्ड संहिता : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व वर्तमान स्वरूप (06)

क्रमशः ...

  • प्रथम विधि आयोग ने दण्ड विधि का प्रारुप 14 अक्टूबर, 1837 कि गवर्नर-जनरल को प्रेषित किया जिसे भारत के विभिन्न न्यायालयों में कार्यरत न्यायाधीशों तथा विधि परामर्शदाताओं को उनके सुझाव हेतु परिचालित किया गया। दण्ड विधि के इस प्रारुप को संशोधित करने के लिए 26 अप्रैल, 1845 को दूसरे विधि आयोग का गठन किया गया जिसने दण्ड विधि के सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट को दो भागों में सन् 1846 तथा 1847 में प्रेषित किया। यह प्रस्तावित प्रारूप लगभग 9 वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा जिसे बाद में गवर्नर-जनरल की परिषद् के विधि-सदस्य बेथ्यून तथा ‘पीकाकने संशोधित किया।
  • इस संशोधित प्रारुप को सन् 1856 में विधान परिषद् की पटल पर रखा गया जिसे विधान मण्डल ने 6 अक्टूबर, 1860 को पास कर दिया और उसी दिन इसे तत्कालीन वायसराय लार्ड केनिंग ने अपनी अनुमति प्रदान कर दी।
  • 6 अक्टूबर, 1860 ई. को स्वीकृति भारतीय दण्ड संहिता को ब्रिटिश वायसराय 1 मई, 1861 से लागू करना चाहते थे। लेकिन फिर यह सोचा गया कि कुछ समय तक इस अधिनियम को आम लोगों और भारतीय अधिकारियों को समझने का अवसर दिया जाये तथा उसे तुरन्त लागू न किया जाये क्योंकि वास्तव में यह एक ऐसा कानून था जिसके कारण पुराने जितने भी दण्ड विधान थे उन्हें निरसित कर दिया गया था। इसी कारण इस अधिनियम को प्रभावशील किये जाने की तारीख बदल दी गई और यह विधान 1 मई, 1861 के स्थान पर 1 जनवरी, 1862 को प्रभावी किया गया।

शेष अगले नोट्स में ..

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