लोकतांत्रिक देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है उतनी ही महत्वपूर्ण है पारदर्शिता।भारतीय संविधान में नागरिकों के मूल अधिकार के रूप में वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का वर्णन है जिसका मतलब यह होता है कि हर देशवासी को अपनी बात कहने का अधिकार है जहां तक वह दूसरे के लिए मुश्किल ना पैदा करें।सोशल मीडिया के आने से ही संवैधानिक अधिकार को एक नया स्वरूप मिला जिसे हम आज के जागरूक और बेबाक समाज के रूप में देख रहे हैं।साइबर क्रांति भारत में ही नहीं बल्कि सारे विश्व पटल पर हो रही है जिससे जैसमिन क्रांति से लेकर तुर्की में हो रहे आंदोलन के रूप में देखा जा सकता है। इसका सबसे चिंताजनक पक्षी यह है कि इसका गलत हाथों में आकर प्रयोग होना। एक ओर जहां आतंक का खतरा है वहीं दूसरी और गोपनीयता का संकट बना हुआ है। हाल ही में जम्मू कश्मीर में बुरहान वानी के मारे जाने पर कश्मीर में नेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इसके अतिरिक्त आईएसआईएस नेट सेवाओं के माध्यम से युवाओं को अपने संगठन में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करता है।भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में हुई सांप्रदायिक हिंसा और राजस्थान के नागौर जिले की घटना ने सोशल मीडिया का स्याह पक्ष को उजागर किया है।ऐसी घटनाएं भारत की नहीं चीन पाकिस्तान बांग्लादेश में भी हुई जहां जल्द ही इस प्रकार की सामग्री को परोसने पर रोक लगा कर ऐसे संकट की संभावनाओं को कम कर दिया है। चरमपंथी संगठनों द्वारा इसका दौरा प्रयोग किया जा रहा है।एक तो वे इसके द्वारा नए सदस्यों की नियुक्ति करते हैं और दूसरा उनके लिए यह खुफिया जानकारी हासिल करने का मंच भी साबित होता है जो सरकार के सामने एक नई जटिल चुनौती बनता जा रहा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी विशेषज्ञों द्वारा देशों में की गई जासूसी के आधार पर भारत पांचवा सबसे ज्यादा जासूसी करने वाला देश है।
वैश्विक स्तर पर कई ऐसी शक्तियां हैं जो इसका फायदा उठा रही हैं ओबामा की जर्मनी यात्रा से पहले वहां पर जासूसी होना इन्हीं बातों की ओर संकेत करता है।चीन का नाम इस प्रकार के कार्यों में लगातार उछाला जा रहा है भले वह उसे हर बार नकारता रहता हो।