क्रमशः ...
- अपराध” की सर्वमान्य व सर्वोत्तम परिभाषा निम्नवत् –
“किसी सक्षम व्यक्ति के द्वारा साशयपूर्वक रीति से राजनियम के विरुध्द किया गया कार्य अपराध कहलाता है।“
- अपराध के आवश्यक तत्व निम्नलिखित है –
- एक मानव हो,
- ऐसे मानव के मन में एक दुराशय हो,
- ऐसे आशय को पूरा करने के लिए किया गया कोई कार्य, और
- ऐसे कार्य द्वारा किसी दूसरे मानव या सम्पूर्ण समाज को एक क्षति।
स्मरणीय रहे कि एक अपराध के गठन के लिए उपर्युक्त चारों तत्वों की पूर्ति होना आवश्यक है।
- किसी कार्य को अपराध के रूप में विधि द्वारा दण्डनीय होने के लिए किसी मानव द्वारा किया जाना चाहिए।
- “व्यक्ति” (Person) दो प्रकार के होते हैं – (1) प्राकृतिक व्यक्ति (Natural Person); (2) कृत्रिम व्यक्ति (Artificial Person) । इसका उल्लेख धारा 11 में किया गया है। ‘प्राकृतिक व्यक्ति’ ऐसे व्यक्ति को कहते हैं जिसकी उत्पत्ति प्रकृति के नियमों के अनुसार होती है, वह शरीरयुक्त व विवेकशील होता है जबकि ‘कृत्रिम व्यक्ति’ शरीरयुक्त नहीं होता बल्कीसे विधि की दृष्टि में व्यक्ति का दर्जा प्राप्त रहता है जिस कारण इसे विधिक व्यक्ति (Legal Person) भी कहा जाता है।
- भारतीय दण्ड संहिता केवल प्राकृतिक व्यक्तियों के ऊपर लागू होती है कृत्रिम अथवा विधिक व्यक्तियों पर नहीं।
आगे अभी और है ...