क्रमशः ...
- आधुनिक विधिशास्त्र में मान्य निगम (Corporation) तथा अन्य कृत्रिम व्यक्ति दण्ड के योग्य नहीं है क्योंकि अमुचित दण्ड का तात्पर्य आर्थिक (Pecuniary) तथा शारीरिक (Bodily) दोनों से है परन्तु शारीरिक दण्ड कृत्रिम व्यक्तियों को नहीं दिया जा सकता।
- किसी कार्य को अपराध के अन्तर्गत विधि द्वारा दण्डनीय होने के लिए यह आवश्यक है कि ऐसा कार्य किसी मानव द्वारा किया जानाचाहिए और ऐसा मानव उस कार्य को अच्छी तरह सम्झने की क्षमता रखता हो।
- आपराधिक दायित्व की पप्रकृति को संक्षिप्त रूप्से इस सूत्र के अन्तर्गत प्रस्तुत कर दिया गया है – “केवल कार्य किसी को अपराधीनहीं बनाता यदि उसका मन भी अपराधी न हो।“ (Actus non facit reum nisi mens sit rea)। इसी सूक्ति से एक दूसरी सूक्ति यह निकलती है कि “मेरे द्वारा मेरी इच्छा के विरुध्द किया गया कार्य मेरा नहीं है।“ अतः किसी कार्य को दण्डनीय होने के लिए इच्छित होना चाहिए। इन दोनों सूक्तियों से यह निष्कर्ष निकलता है कि अपराध को गठित होने के लिए आशय और कर्म दोनों का संगामी होना आवश्यक है। जहाँ किसी अपराध को गठित होने के लिए आवश्यक आपराधिक आशय अनुपस्थित हो वहाँ अभियुक्त व्यक्ति को दण्डित नहीं किया जा सकता।
(सही मायने मे कोई व्यक्ति तभी अपराधी होता है जब उसका मन अपराधी हो।)
आगे अभी और है ...