भारत विविधताओं का देश है यहां भौगोलिक, प्रजातीय, भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक विविधता यहां सहज रूप से द्रष्टव्य है इसीलिए भारतीय संस्कृति को सामासिक या समन्वित संस्कृति भी कहा जाता है, क्योंकि यह प्रत्येक समूह को उसकी विशेषताओं के साथ सहज रूप में स्वीकार करती है। भौगोलिक विविधता की बात की जाए, तो देश के एक छोर पर हिम मंडित हिमालय दिखाई देता है, तो उत्तर से दक्षिण की ओर आगे बढ़ने पर गंगा यमुना एवं ब्रह्मपुत्र की घाटियां नीलगिरी पर्वत श्रेणियों का पठार। पश्चिम से पूर्व की ओर भी वैसे ही दिखाई देती है । भारत की यह भौगोलिक विविधता देश के लिए लाभकारी है, क्योंकि यह एक दूसरे के पूरक बन कर न केवल जनजीवन को लाभान्वित करती है अपितु एक दूसरे के जीवन का आधार भी प्रस्तुत करती है। इससे देश में संसाधन गहनता बढ़ती है। परंतु जब भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर एक क्षेत्र के लोग अन्य क्षेत्र के लोगों से खुद को भी नियंत्रित समझने लगते हैं, तथा अपने लिए प्रथक क्षेत्रों की मांग करने लगते हैं, तो इससे विघटन कारी प्रवृत्ति का जन्म होता है, जो राष्ट्रीय एकता अखंडता के लिए जोखिम पूर्ण साबित होती है। इसी प्रकार भारत प्रजातीय विविधता की दृष्टि से भी संपन्न देश है। यहां मुख्यतः नीग्रोटो, प्रोटो-ऑस्ट्रेलियाड, नॉर्डिक, भूमध्यसागरीय, मंगोल आदि प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत युगों से परस्पर विरोधी प्रजातियों और सभ्यताओं का संगम स्थल रहा है उनमें आत्मसाती करण तथा समन्वय की प्रक्रिया निरंतर चलती रही हैं। प्रजातीय भिन्नता होने के बावजूद अमेरिका एवं अफ्रीका की भांति यहां प्रजातीय संघर्ष एवं टकराव नहीं हुए बल्कि पारस्परिक सद्भाव और सहयोग ही पनपा है। इससे भारत में सांस्कृतिक सघनता बढ़ी है कभी-कभी कुछ समूहों द्वारा अपनी सांस्कृतिक एवं प्रजातीय पहचान के संरक्षण की मांग करते हुए मुखर विरोध भी किया जाता रहा है। प्रजातिय विशेषता के आधार पर संगठित होने की प्रवृत्ति देश की एकता एवं अखंडता के लिए आवश्यक रूप से जोखिम पूर्ण है।