दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 : प्रारम्भिकी (धारा 1-5) - 04

क्रमशः .....

  • (ii) धारा 2(b) के अनुसार – आरोप (charge) के अन्तर्गत, जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष हो, आरोप का कोई भी शीर्ष है। आरोप किसी अपराध के विचारण की सारभूत अपेक्षा है क्योंकि आरोप के प्रतिप्रेषण के बिना विचारण संभव नही है। यह ऐसा दस्तावेज होता है कि जिनके द्वारा अभियुक्त को इस बात की सूचना होती है कि उसके विरुध्द अमुक कथित अपराध का अभियोग है। वस्तुतः प्रतिरक्षा के क्रम के अनुसार भी आरोप् का महत्व व्यापक होता है। संक्षिप्त विचारण के मामले के सिवाय सभी मामलों में विचारण की प्रक्रिया आरोप विरचित (तैयार) किए जाने के बाद ही प्रारम्भ होती है। आरोप अभियुक्त के नाम से सम्बोधित होना चाहिए।
  • (iii) अपराधों को उनकी प्रकृति के अनुसार – उन्हें दो भागों में बाँटा गया है – (1) संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence),  एवं (2) असंज्ञेय अपराध (Non Cognizable Offence)। अपराधों का यह वर्गीकरण उनकी गम्भीर एवं सामान्य प्रकृति के आधार पर किया गया है। ऐसे अपराध जो संगीन एवं गम्भीर प्रकृति के होते है, वे संज्ञेय अपराध समझे जाते हैं एवं जो सामान्य प्रकृति के होते है वे असंज्ञेय अपराध समझे जाते हैं।
  • संहिता की धारा 2 (c) के अनुसार संज्ञेय अपराध एवं मामले से अभिप्राय ऐसे अपराध एवं मामले से है जिसमें पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को प्रथम अनुसूची के अनुरूप या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अनुरूप वारण्ट के बिना गिरफ्तार कर सकता है।

आगे अभी और है.. 

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