द्वितीय हरित क्रांति

भारत में कृषि उपज में तीव्र वृद्धि करने हेतु उनकी उपज वाले बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, कृषि यंत्रीकरण, बेहतर सिंचाई प्रणाली, आदि का उपयोग किया गया। इससे खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी मात्रा में वृद्धि हुई। परंतु इसका लाभ सीमित क्षेत्र, सीमित फसलों, तथा सीमित किसानों तक ही पहुंच सका। इसलिए संतुलित कृषि विकास की अवधारणा सुनिश्चित करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा दूसरी हरित क्रांति का आवाहन किया गया। द्वितीय हरित क्रांति की अवधारणा को व्यापक बनाया गया है। इसमें बहू फसलें, पशुपालन, मत्स्य पालन आदि को भी शामिल किया गया है। इसमें रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर जैविक उर्वरक का प्रयोग करने, कृषि भूमि, जल एवं पर्यावरण संरक्षण एवं संतुलित प्रारूप को बनाए रखने पर जोर दिया गया है। देश में हरित क्रांति का प्रभाव कुछ विशेष फसलों तक ही सीमित रहा, अन्य फसलों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा तथा व्यापारिक फसलें भी अप्रभावित रही। जिसके कारण द्वितीय हरित क्रांति की आवश्यकता महसूस हुई। देश में बढ़ती जनसंख्या एवं बढ़ते हुए नगरीकरण के दृष्टिगत बढ़ती खाद्यान्न आवश्यकता के लिए भी कृषि क्षेत्र में दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता महसूस की गई है। कृषि क्षेत्र में आई स्थायित्व को दूर करने तथा पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए हरित क्रांति अति आवश्यक है। स्पष्ट है कि सरकार का सभी फसलों सभी क्षेत्रों तथा सभी सुविधाओं को समस्त किसानों तक पहुंचाने का है। हरित क्रांति न केवल किसान बल्कि सरकार की अर्थव्यवस्था में वृद्धि होने की पूरी संभावना की गई है।
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