यह विदेशी पूंजी निवेश को बढ़ावा देता है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर निजी क्षेत्र की कंपनियों पर पड़ना स्वाभाविक है।
निजीकरण की प्रक्रिया में परिसंपत्ति की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाना एक कठिन कार्य है। अतः इस प्रक्रिया से सरकार के लिए घाटे की समस्याएं बनी रहती हैं। व्यवहारिक रूप में देखा जाए तो निजी करण से प्राप्त राशि का उपयोग बजटीय संतुलन को बनाए रखने में किया गया।
निजीकरण की प्रक्रिया में निजी संगठनों के एकाधिकार बढ़ने की संभावनाएं बनी रहती है। अतः निजी करण एक प्रकार से लोक अधिकार के स्थान पर निजी एकाधिकार को प्रोत्साहित करती है। परिणाम स्वरुप आर्थिक असमानता दिखाई देती है।
इस प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव होने के कारण सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार एवं भाई भतीजा वाद जैसे आरोपों को देखा जा सकता है। परिणाम स्वरुप आम जनता में निजी संगठनों के प्रति विश्वास की भावना में कमी दिखाई देती है।
निजीकरण सिर्फ एक तकनीकी अभ्यास न होकर राजनीतिक अभ्यास हो गया, अर्थात इससे संबंधित निर्णय को प्राप्त करने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के मध्य आम सहमति बनाना एक कठिन कार्य है।
निजी करण की प्रक्रिया में इससे प्रभावित कार्मिकों के कल्याण एवं इनके व्यापक हितों को संरक्षित करने पर बल नहीं दिया गया। जिस कारण श्रमिकों का विरोध निजी करण की प्रक्रिया में एक प्रतिरोधक का कार्य करता है।
निजीकरण नौकरशाही के परंपरागत कार्य प्रक्रिया के कारण प्रतिकूल प्रभाव डालता है। क्योंकि प्रशासन का अभिप्राय प्रभुत्व से है।
निजीकरण की प्रक्रिया में सरकार के द्वारा लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित न किए जाने के कारण प्रतिरोध के स्वर सुनाई देते हैं।