एस आई पद्धति में मूल राशियों को जोड़े जाने का इतिहास
भौतिकी कि वे राशियां जिन्हें प्रदर्शित करने के लिए अन्य राशियों की जरूरत नहीं होती अर्थात जिन्हें अन्य राशियों की सहायता के बिना मापना तोलना संभव है, उन्हें मूल राशि कहते हैं।
प्राचीन समय में राशियों के माप तोल की कई पद्धतियां प्रचलित थी जिस कारण से व्यापार में अव्यवस्था और भ्रम की स्थिति बनी रहती थी। इस अव्यवस्था को दूर करने के लिए 1875 के मीटर समझौते में लंबाई, द्रव्यमान एवं समय को मूल राशि माना गया । 1960 में इसी सूची में ऊष्मा, गति, तापमान, विद्युत धारा, तथा ज्योति - तीव्रता को भी जोड़ दिया गया।
पदार्थ की मात्रा को मोल , 1970 में मूल राशि में शामिल किया गया था। इसी समय समतल कोण तथा घन कोण को अनुपूरक मूल राशि माना गया था लेकिन माप तोल की अंतरराष्ट्रीय समिति ने 1995 में इन्हें व्युत्पन्न राशि माना।
इसलिए वर्तमान में कुल मिलाकर सात मूल राशियां और दो अनुपूरक राशियां हैं।
SI SYSTEM प्रणाली की विशेषताएं
• इस प्रणाली में मात्रकों को छोटे अक्षरों में लिखा जाता है।
जैसे मीटर (m), सेकंड (s), कैंडेला (cd)
• वैज्ञानिक नाम पर लिए गए मात्रकों का पहला अक्षर छोटे तथा संकेत बड़े अक्षर में लिखते हैं। जैसे बल का मात्रक न्यूटन (newton) तथा उसके मात्रक को (N) से प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रकार कूलाम (C) , एंपियर(A)।
• मात्रकों को कभी भी बहुवचन में नहीं लिखना चाहिए जैसे 100ms लिखना गलत है।
• मात्रकों के बाद कोई विराम सूचक चिन्ह नहीं लगाना चाहिए।
• इस पद्धति में सात मूल राशियां अपनाई गई है :-
लंबाई, द्रव्यमान,समय, विद्युत धारा, ताप, ज्योति - तीव्रता पदार्थ की मात्रा।
• इसके अलावा दो अन्य राशियों समतल कोण तथा घण कोण को भी अनुपूरक मूल राशि माना गया है।