महात्मा गांधी ने प्रीता में एक नए तरह के आंदोलन के रास्ते पर चलते हुए वहां की नस्ल भी दी सरकार से सफलतापूर्वक लोहा लिया था। इस मार्ग को सत्याग्रह कहा गया। सत्याग्रह के विचार में 'सत्य की शक्ति पर आग्रह' और सत्य की खोज पर जोर दिया था। इसका अर्थ यह था कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है और संघर्ष अन्याय के खिलाफ है तो उत्पीड़न से मुकाबला करने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। प्रतिरोध की भावना या आक्रामकता का सहारा के लिए बिना सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे भी अपने संघर्ष में सफल हो सकता है। केवल शत्रु को ही नहीं बल्कि सभी लोगों को हिंसा के जरिए सत्य को स्वीकार करने पर विवश करने की वजह सच्चाई को देखने और सहज भाव से शिव कार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इस संघर्ष में अंततः सत्य की जीत होती है। गांधी जी का विश्वास था कि अहिंसा का यह मार के सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बांध सकता है।
भारत आने के बाद गांधीजी ने कई स्थानों पर सत्याग्रह आंदोलन चलाया। 1916 में उन्होंने बिहार के चंपारण इलाके का दौरा किया और दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। 1917 मैं उन्होंने गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों की मदद के लिए सत्याग्रह का आयोजन किया। फसल खराब हो जाने और लेगी की महामारी के करण खेड़ा जिले के किसान लगान चुकाने की हालत में नहीं थे। वह चाहते थे कि वसूली में ढील दी जाए। 1928 में गांधीजी सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के भी सत्याग्रह आंदोलन चलाने अहमदाबाद जा पहुंचे।