असहयोग आंदोलन ( 1920-22 ई )

बीसवीं सदी के दूसरे दशक का अंतिम वर्ष अर्थात 1920 ईस्वी भारतीय जनता के लिए निराशा और क्षोभ का वर्ष था। जनता उम्मीद लगाए बैठी थी कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश हुकूमत उनके लिए कुछ करेगी लेकिन रौलट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और पंजाब में मार्शल ला ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। भारतीय जनता समझ गई कि ब्रिटिश हुकूमत से शिवाय दमन के उन्हें और कुछ मिलने वाला नहीं है।

ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों के विरोध में 1920 ईस्वी में असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम पर विचार करने के लिए कोलकाता में कांग्रेसका एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया। इसी अधिवेशन में गांधी जी ने असहयोग का प्रस्ताव पेश किया। यद्यपि श्रीमती एनी बेसेंट ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और कहा कि यह प्रस्ताव भारतीय स्वतंत्र के लिए बड़ा धक्का है। इससे समाज और सभ्य जीवन के बीच संघर्ष छिड़ सकता है ।

सुरेंद्रनाथ बनर्जी, मदन मोहन मालवीय, चितरंजन दास, बिपिन चंद्र पाल, जिन्ना आदि ने भी प्रारंभ में विरोध किया परंतु अली बंधु तथा मोतीलाल नेहरू ने समर्थन के प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। यही वह क्षण था जहां से गांधी युग की शुरुआत हुई।

असहयोग प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु---

1. सरकारी उपाधि एवं अवैतनिक सरकारी पदों को छोड़ दिया जाए।

2. सरकार द्वारा आयोजित सरकारी तथा अर्ध- सरकारी उत्सव का बहिष्कार किया जाए।

3. स्थानीय संस्थाओं की सरकारी सदस्यता से इस्तीफा दिया जाए।

4. सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार किया जाए।

5. विदेशी सामानों का पूर्णता बहिष्कार किया जाए।

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