ज्वार तथा भाटा के विषय में संक्षिप्त जानकारी

सागरीय जल की हलचल का विशालतम समूह ज्वार भाटा के रूप में देखने को मिलता है ज्वार भाटा सागर जल तल में उत्पन्न विशालतम सतही तरंगें हैं जिसमें संपूर्ण सतही जल राशि का लंबवत उत्थान एवं पतन दोलन के रूप में प्राप्त होता है ।

ज्वार भाटा को प्रभावित करने वाली शक्तियां - ज्वार भाटा निम्न शक्तियों के द्वारा प्रभावित होता है 

(1)  चंद्रमा एवं सूर्य की आकर्षण शक्ति के द्वारा 
(2) पृथ्वी द्वारा आरोपित अपकेंद्री बल के द्वारा
    
          चंद्रमा सूर्य के द्रव्यमान से कम होते हुए भी अधिक समीप अवस्थित है इसलिए इनकी आकर्षण शक्ति सूर्य के सापेक्ष 11:5 है अर्थात 2.17 गुना अधिक है  ।

ज्वार भाटा के प्रकार - ज्वार भाटा निम्न प्रकार का होता है

(1)  मासिक ज्वार -  यह दो प्रकार से प्राप्त होता है 

   ( a) दीर्घ ज्वार 
    b लघु ज्वार
    
(2) दैनिक ज्वार - दिन में प्राप्त होने वाली एक ज्वार एवं एक भाटा को ही दैनिक ज्वार कहा जाता है ।

(3) अर्द्ध दैनिक ज्वार - जब दिन में 2 ज्वार एवं दो भाटे की प्राप्ति होती है तथा प्रत्येक ज्वार एवं भाटे का आयाम समान पाया जाता है तो इसे अर्द्ध दैनिक ज्वार कहते हैं ।

(4) अयन वृत्तीय ज्वार - जब सूर्य एवं चंद्रमा का कर्क एवं मकर रेखाओं पर लंबवत हो तो यहां प्राप्त होने वाला ज्वार अयन वृत्तीय ज्वार कहलाता है।

(5) उपसौर एवं अपसौर ज्वार - पृथ्वी दीर्घ वित्तीय कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करती हुई एक बार सूर्य के समीप होती है तो दूसरी बार सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर होती है अतः स्पष्ट है कि उपसौर, अपसौर से अधिक ऊर्जा प्राप्त होता है ।


   पृथ्वी का सबसे ऊंचा ज्वार उत्तर अमेरिका में फंडी की खाड़ी में आता है जबकि भारत का सबसे ऊंचा ज्वार कच्छ की खाड़ी के मुहाने पर अवस्थित ओखा तट के समीप आता है ।  

 सूर्य  चंद्रमा एवं पृथ्वी के गतियों के संदर्भ में स्थिर सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ चंद्रमा लगभग 29 दिनों में एक चक्कर पूरा करता है, जब सूर्य एवं पृथ्वी के मध्य चंद्रमा की उपस्थिति हो तो इसे अमावस कहते हैं । जबकि यदि सूर्य एवं चंद्रमा के मध्य पृथ्वी हो तो यह पूर्णिमा की दशा कहलाती है इन दोनों ही दिनों में सूर्य चंद्रमा एवं पृथ्वी रेखीय अवस्थिति में प्राप्त होते हैं। जिसे Syzygy कहते हैं ।
  
यह दो प्रकार की होती है -

(1) युति 
(2) वियुती

Posted on by