मनुष्य में रक्त परिसंचरण तंत्र की खोज विलियम हार्वे ने किया था । मनुष्य का हृदय समस्त प्राणियों में सबसे विकसित 4 चेंबर का होता है जिसमें दो अलिंद तथा दो निलय उपस्थित होता है।
हृदय का दाया भाग अशुद्ध रक्त के परिवहन के लिए उत्तरदाई है जबकि बाया भाग शुद्ध रक्त के लिए प्रयुक्त होता है दांया आलिंद तथा दाएं निलय दाहिनी ओर जबकि बाया निलय तथा बाया अलिंद बांई ओर स्थित होता है।
मनुष्य में बंद परिसंचरण तंत्र तथा दोहरा परिसंचरण तंत्र उपस्थित होता है क्योंकि हृदय में रक्त दो बार प्रवेश करता है तथा यह वाहिनीयों में बहता है शरीर के विभिन्न उत्तक से ऑक्सीजन रहित रक्त (अशुद्ध रक्त) शिरा के माध्यम से हृदय तक पहुंचाया जाता है जबकि शुद्ध रक्त धमनियों के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाया जाता है ।
फुफ्फुस धमनी के माध्यम से अशुद्ध रक्त फेफड़ों तक पहुंचाया जाता है जबकि फुफ्फुस शिरा द्वारा शुद्ध रक्त बाय अलिंद में प्रवेश करता है। हृदय पेरिकार्डियल झिल्ली से ढका रहता है ,जो हृदय को वाह्य आघातों से बचाता है ।
हृदय में प्राकृतिक रूप से पेसमेकर पाया जाता है जो विद्युत धारा उत्पन्न करता है जो हृदय को क्रियाशील बनाता है । शरीर के विभिन्न ऊतक से अशुद्ध रक्त अग्र महाशिरा और पश्च महाशिरा के द्वारा दांए आलिंद में प्रवेश करता है। जहां से होता हुआ दाएं निलय में जाता है यहां से रक्त फुफ्फुस धमनी से होता हुआ फेफड़े तक पहुंचता है जहां से यह फुफ्फुस शिरा के माध्यम से बाय आलिंद में प्रवेश करता है बाय आलिंद से बाएं निलय में तथा यहां से महाधमनी के द्वारा शरीर के विभिन्न ऊतकों में चला जाता है।
महाधमनी शरीर की सबसे बड़ी धमनी है इसमें एक बार में हृदय के संकुचन से 70ml रक्त निकलता है हृदय के संकुचन और अकुचन से लव डब की आवाज आती है ।