भारतीय दण्ड संहिता : अपराध का अर्थ एवं परिभाषा - 08

क्रमशः  ...

  • यदि कोई व्यक्ति दुराशय के साथ कोई कार्य करता है तो वह अपराध की श्रेणी में तब आयेगा जबकि ऐसे कार्य द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति या सम्पूर्ण समाज को क्षति पहुँचती हो। यही अपराध का अन्तिम आवश्यक तत्व है।
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 44 के अनुसार – ‘क्षति’ शब्द इस प्रकार की हाँइ का सूचक है जो किसी व्यक्ति के शरीर, मन, ख्याति या सम्पत्ति को अवैध रूप से कारित हुई हो। ऐसी क्षति किसी दूसरे व्यक्ति को अथवा उसके शरीर को या सम्पूर्ण समाज को अवैध रूप से पहुँचायी गई हों।
  • अपवाद -  यद्पि किसी अपराध को पूर्ण होने के लिये चार तत्वों का होना अनिवार्य है, किन्तु इस नियम के निम्नलिखित अपवाद भी है –
    1. कभी-कभी मनोभाव के अभाव में भी अपराध बन जाता है, जैसे – भा.द.सं. की धारा 494 के तहत द्विविवाह का अपराध (पति या पत्नी के जीवन –काल में पुनः विवाह करना, यदि सम्बंध विधिक रूप से विच्छेद नहीं हुआ है तो)
    2. कुछ ऐसे मामले हैं जिनमें अपराधिक कृत्य यद्यपि पूर्ण न हुआ हो या किसी व्यक्ति को क्षति न हुई हो फिर भी अपराध गठित हो जाता है। ये अपूर्ण अपराध के मामले है, जैसे – प्रयत्न (Attempt), दुष्प्रेरण (Abetment) व षडयंत्र (Conspiracy) आदि।
    3. कुछ ऐसे भी अपराध होते हैं जिनमें न तो आपराधिक कृत्य हो और न ही किसी व्यक्ति को क्षति हो परन्तु निरोधक कार्यवाही के तहत इन्हें अपराध घोषित किया जाता है। जैसे – डकैती डालने की तैयारी करना (धारा 399), डैकती डालने के उद्देश्य से एकत्रित होना (धारा 402)।

आगे अभी और है ... 

Posted on by