अपराध के मानसिक तत्व
- आशय (Intention)
- प्रयोजन (Motive)
- दुराशय (Mens-rea)
- ज्ञान (Knowledge)
आपराधिक दायित्व की प्रकृति
अभियुक्त ने आपराधिक विधि के अन्तर्गत कोई अपराध किया है, इसे साबित करने के लिए अभियोजन को न केवल यह साबित करना होता है कि उसने कोई अपराध किया है बल्कि अभियोजन को यह भी साबित करना होता है कि उसने अपराध को आपराधिक मनःस्थिति से किया है अर्थात् यह अपराध इस पूर्ण ज्ञान के साथ करता है कि वह क्या कर रहा है। उदाहरण – यदि ‘क’ पर यह आरोप है कि उसने जारकर्म कारित किया है, तो यह भी दिखाया जाना चाहिए कि वह विवाहित महिला के साथ मैथुन क्रिया में संलग्न था और वह जानता था कि वह दूसरे की विवाहिता पत्नी है तथा वह जानबुझकर मैथुन क्रिया में संलग्न था। यदि यह साबित कर दिया जाये कि वह इस दण्डनीय कार्य में संलग्न नही था, ‘क’ दण्डित नहीं किया जायेगा।
- जिस अपराध में विशेष इच्छा या मानसिक स्थिति आवश्यक है, उसके लिये कोई व्यक्ति अपराधी नहीं होगा, यदि उसका मन दोषपूर्ण नहीं था एवं दूसरे व्यक्ति के आदेश से उसने वह अपराध किया था। किंतु जिस व्यक्ति के आदेश से वह अपराध हुआ, वह उत्तरदायी होगा।
- साधारणत: कोई व्यक्ति किसी काम या उसकी अवहेलना के लिये उत्तरदायी नहीं होगा, यदि उसने स्वयं अपराध नहीं किया है या निर्धारित काम करने से विरत नहीं हुआ है या किसी दूसरे व्यक्ति को अपराध करने के लिये अधिकार नहीं दिया है और न उसे निर्धारित काम करने से विरत होने की प्रेरणा दी है।
- कोई मालिक अपने सेवक या ऐजेंट के विद्वेष, कपट या काम की उपेक्षा के लिये दंडित नहीं किया जा सकता, क्योंकि सेवक या एजेंट की मानसिक स्थिति मालिक की मानसिक स्थिति नहीं कही जा सकती।
- किंतु सीमित वर्ग के कुछ मामलों में जहाँ मानसिक स्थिति अपराध के लिये आवश्यक नहीं है, अपने सेवक या एजेंट के सामान्य कार्य के दौरान में किए गए कामों के लिये मालिक उत्तरदायी होगा, भले ही उसे ऐसे काम की जानकारी न रही हो और वे काम उसके आदेश के विरुद्ध ही क्यों न किए गए हों।
आगे अभी और है ...