भारतीय प्राचीन ग्रंथ में चंद्रमा को भूमि का पुत्र अर्थात भूमि के द्वारा उत्पन्न उपग्रह कहा गया है।
अतः इसके साथ-साथ यह भी अवधारणा व्यक्त की गई है कि चंद्रमा- सूर्य, पृथ्वी के मध्य में आने वाला सबसे छोटा पिण्ड है।
चंद्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण में चंद्रमा के स्थान का विशेष योगदान होता है। चंद्रमा के बढ़ते और घटते हुए आकार का आकलन करके एक महीने में पड़ने वाली अमावस्या और पूर्णिमा की सटीक जानकारी लगाई जा सकती है।
प्रत्येक महीने में दो पक्ष होते हैं शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष जो अमावस्या और पूर्णिमा का निर्धारण करते हैं। शुक्ल पक्ष में अमावस्या के 1 दिन बाद चांद दिखाई पड़ता, यह 7 दिन में अर्ध्रचन्द्राकार रुप ले लेता है, और 15 दिन बाद इसका पूर्ण रूप दिखाई पड़ता है। उसके बाद चंद्र कलाएं घटती हैं। और 15 दिन बाद पुनः अमावस्या आ जाती है। अमावस्या को चांद नहीं दिखाई देता है।
अर्थात चंद्रकलाओं के घटते हुए क्रम को कृष्ण पक्ष तथा बढ़ते हुए क्रम को शुक्ल पक्ष की संज्ञा दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया को चंद्रमा और चंद्रकलाओं के अंतर्गत रखा जाता है।
चंद्रमा की यह कलाएं महासागरों में उत्पन्न दीर्घ ज्वार एवं लघु ज्वार उत्पन्न होने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
क्योंकि जब सूर्य, चंद्रमा, और पृथ्वी एक सीध होते हैं, तो दीर्घ ज्वार उत्पन्न होता है। सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी की यह स्थिति अमावस्या और पूर्णिमा को घटित होती है। अर्थात सीधे में होते हैं।
जबकि कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी की तिथि में सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी सेे एक साथ समकोण बनाते हैं। इस स्थिति में सूर्य तथा चंद्रमा पृथ्वी पर उपस्थित महासागरीय जल को अपनी - अपनी ओर आकर्षित करते हैं जिससे लघु ज्वार उत्पन्न होता है।