उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में इंग्लैंड में वस्तुओं के उत्पादन के संदर्भ में अधिकाधिक मशीनों का उपयोग किया गया अर्थात मानवीय श्रम के स्थान पर मशीन का उपयोग किया गया। इसके बावजूद भी उत्पादन के निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सका। अर्थात मशीनी प्रणाली स्वतः कहीं ना कहीं दोषों से ग्रसित थी। जैसे-
श्रमिक और प्रबंधन दोनों का अधिकतम ध्यान मुनाफे के बंटवारे पर दिया गया न कि उत्पादन की मात्रा को प्रोत्साहित करने पर।
श्रमिकों के उत्पादकता एवं कार्य कुशलता के संदर्भ में ओवरटाइम ड्यूटी जैसे शब्दों का अभाव था।
श्रमिकों की रुचि एवं योग्यता को ध्यान दिए बिना कार्यों का वितरण किया गया।
श्रमिकों की मजदूरी का भुगतान प्रति घंटे के आधार पर किया गया।
संगठन की कार्य पद्धति का व्यवस्थित एवं गैर नियोजित होना प्रबंधक के द्वारा संगठन के कार्य प्रक्रिया के विषय वस्तु पर उचित दिशा निर्देशन का अभाव होना।
श्रमिक एवं प्रबंधक के कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का स्पष्ट बंटवारा नहीं किया गया।
उपरोक्त सीमाओं को दूर करने के लिए टेलर एवं उनके सहयोगियों के द्वारा वैज्ञानिक प्रबंध आंदोलन की शुरुआत की गई। जिसके निष्कर्षों के आधार पर वैज्ञानिक प्रबंध सिद्धांत का जन्म हुआ।