औद्योगिक क्रांति के परिणाम स्वरुप मशीनी प्रणाली के उत्पादन में आई कमी के दोषों को दूर करने के लिए टेलर द्वारा वैज्ञानिक प्रबंध सिद्धांत दिया गया। इस संदर्भ में टेलर के द्वारा चार मौलिक नियमों का प्रतिपादन किया गया।
1-कार्य को विज्ञान के रूप में विकसित किया जाए-
इस संदर्भ में टेलर का मानना था कि किसी भी कार्य को विश्लेषण के आधार पर किया जाए न कि अनुभव एवं अनुमान के आधार पर। इस संदर्भ में टेलर के द्वारा तीन तकनीकों का सहारा लिया गया- समय अध्ययन, गति अध्ययन एवं थकान ध्यान।
2- वैज्ञानिक आधार पर अर्थात योग्यता के आधार पर कर्मचारियों की नियुक्ति एवं उनका प्रगतिशील विकास-
टेलर का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक कार्य करने के लिए योग्य नहीं होता है। इसलिए रुचि एवं योग्यता को ध्यान में रखकर कार्यों का वितरण किया जाए। आज भारतीय लोक प्रशासन में इसका उपयोग कार्मिकों की भर्ती एवं प्रशिक्षण के संदर्भ में किया जाता है।
3- कार्य एवं कर्ता के बीच उचित परस्पर तालमेल को स्थापित किया जाए।
4- श्रमिक एवं प्रबंधक के बीच कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का स्पष्ट विभाजन किया जाए।
वैज्ञानिक प्रबंध सिद्धांत के उपरोक्त चारों नियमों को जब व्यवहारिक रूप में लागू किया गया। तो उसका सकारात्मक परिणाम दिखाई दिया आता है। इसे लागू करने के लिए एक अनुकूल वातावरण का होना आवश्यक था। जिसके लिए टेलर में मानसिक क्रांति का प्रतिपादन किया।