दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 : प्रारम्भिकी (धारा 1-5) - 10

क्रमशः....

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 228 के अधीन कारित अपराध की दशा में अपराध कारित होने पर जब चालान पेश किया जाए तो चालान की प्रस्तुति न्यायिक कार्यवाही की कोटि में आएगी।
  • (vii) धारा 2(i)  के अनुसार – न्यायिक कार्यवाही के अन्तर्गत कोई ऐसी कार्यवाही है जिसके अन्तर्गत साक्ष्य वैध रूप से शपथ पर लिया जाता है या लिया जा सकता है।
  • (viii) धारा 2 (I) के अनुसार – असंज्ञेय अपराध एवं मामले से अभिप्राय ऐसे अपराध एवं मामले से है जिसमें पुलिस अधिकारी को वारण्ट के बिना गिरफ्तार करने का प्राधिकार नहीं होता है।
  • (iX) धारा 2 (n) के अनुसार – अपराध से तात्पर्य किसी ऐसे कार्य या कार्यलोप से है जो तत्समय प्रवृत्त विदि द्वारा दंडनीय बनाया गया है या इसके अन्तर्गत कोई ऐसा कार्य भी आएगा जिसकी बावत पशु अतिचार अधिनिय, 1871 की धारा 20 के अन्तर्गत परिवाद लाया जा सकता है। इसके विपरीत दण्ड प्रक्रिया संहिता. 1973 के अधीन अपराध का वर्गीकरण जमानतीय-अजमानतीय तथा संज्ञेय एवं असंज्ञेय अपराध के रूप में किया गया है।
  • (x) दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2(O) के अधीन पुलिस थाने के ‘भारसाधक अधिकारी’ पद की व्याख्या की गई है। साधारणतया थाने पर नियुक्ति वरिष्ठ उप-निरीक्षक उस थाने का पुलिस भारसाधक अधिकारी कहलाता है। परन्तु जब वह थाने से अनुपस्थित हो या बीमारी अथवा अन्य कारणों से वह अपने कर्तव्य पालन में समर्थ न हो, तो उक्त दशा में थाए में ऐसा उपस्थित अधिकारी जो कांस्टेबिल की श्रेणी से उच्च पद का अधिकारी है या राज्य सरकार के निदेशाधीन थाने पर उपस्थित कोई अन्य पुलिस अधिकारी उस थाने का पुलिस भारसाधक अधिकारी माना जाएगा। इस संहिता की धारा 36 के अनुसार थाने के भारसाधक अधिकारी से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी अपने क्षेत्र में पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी की शक्ति प्राप्त होगी।

आगे और भी है...

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