राजकोषीय नीति सरकार की आर्थिक नीति का एक प्रमुख घटक है जिसके अंतर्गत सरकार का सार्वजनिक व्यय ,सार्वजनिक ऋण एवं नई मुद्रा के निर्गमन की नीति के द्वारा राज्य के आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करती है। राजकोषीय नीति के प्रमुख उद्देश्य संसाधनों की गतिशीलता में वृद्धि, संसाधनों का उचित आवंटन, अर्थव्यवस्था में मूल्य स्थिरता, रोजगार सर्जन, क्षेत्रीय संतुलित विकास को प्रोत्साहन तथा पूंजी निर्माण है। राजकोषीय नीति का क्रियान्वयन भारत के वित्त मंत्रालय द्वारा बजट प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है।
यद्यपि आजकल राजकोषीय नीति विकास रणनीति के केंद्र में आ गई है। तथापि भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषताएं एवं राजकोषीय नीति की खुद की तकनीकी संरचनात्मक सीमाओं के कारण राजकोषीय नीति की सफलता के समक्ष कुछ अवरोधक भी दिखाई देते हैं-
राजकोषीय नीति की सफलता में एक बड़ा अवरोधक है इसकी प्रभाविता में समयअंतराल। समय अंतराल न केवल नीति के लागू होने और इसके प्रभावी होने के मध्य होता है अपितु नीति की आवश्यकता और इसके लागू होने के बाद भी लंबा अंतराल देखा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त आमतौर पर यह देखा जाता है कि राजकोषीय नीति के क्रियान्वयन पर स्फीतिक दबाव की स्थिति बनती है। जिससे सरकार के लोकलुभावन कार्यक्रम में वृद्धि हो जाती है। वृद्धि से स्फीति नियंत्रण पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है, और इसका समग्र प्रभाव राजकोषीय नीति की प्रभाविता पर पड़ता है। राजकोषीय नीति में विस्तार वादी रुख से सरकार निजी क्षेत्र के साथ प्रतिस्पर्धा की भूमिका में आ जाती है। इससे निजी क्षेत्र दुष्प्रभावित होता है।
इन सब के अतिरिक्त राजकोषीय नीति का क्रियान्वयन प्रशासनिक तंत्र पर निर्भर करता है। यदि प्रशासनिक तंत्र अकुशल है तो नीतिि भी प्रभावित हो जाती है।