भारत के विशाल साम्राज्य को हथिया लेने के बाद इस पर नियंत्रण रखने और शासन चलाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को उपयुक्त तरीके ईजाद करने पड़े। 1757 से 1857 की लंबी अवधि के दौरान कंपनी की प्रशासनिक नीति अक्सर बदलती रही। फिर भी इसने अपना मुख्य लक्ष्य कभी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने दिया। कंपनी के लक्ष्य थे- कंपनी के मुनाफे में बढ़ोतरी, भारत पर अधिकार को ब्रिटेन के लिए फायदेमंद बनाना तथा भारत पर ब्रिटिश पकड़ को कायम रखकर उसे सुदृढ़ बनाना। इसके अतिरिक्ट अन्य लक्ष्य इन उद्देश्यों की मदद के लिए थे। भारत सरकार का प्रशासनिक ढांचा इन्ही लक्ष्य को पूरा करने के लिए बनाया और विकसित किया गया था। इस मामले में मुख्य जोर कानून और व्यवस्था को बनाए रखने पर दिया जाता था ताकि बिना व्यवधान की भारत के साथ व्यवहार किया जा सके और देश के संसाधनों का दोहन किया जा सके।
सरकार का ढांचा
ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने 1765 में जब बंगाल पर नियंत्रण कर लिया तो इसके प्रशासनिक ढांचे में कोई नया परिवर्तन करने का उनका नाममात्र का भी इरादा नहीं था। वह सिर्फ अपना लाभकारी व्यापार जारी रखना चाहते थे। उनकी यह भी मंशा थी कि कर वसूल कर उसको इंग्लैंड भेजते रहें। 1765 से 1772 तक दोनों सरकारें एक साथ काम करती रही। भारतीय अधिकारियों को पहले की तरह काम करने की अनुमति थी लेकिन वह ऐसा ब्रिटिश गवर्नर तथा अधिकारियों की देखरेख में ही कर सकते थे। भारतीय अधिकारियों के पास दायित्व थे लेकिन अधिकार नहीं थे। इसके विपरीत कंपनी के अधिकारियों के पास अधिकार पूरे थे लेकिन उनका कोई दायित्व नहीं था। दोनों ही तरफ के अधिकारी भ्रष्ट और दुराचारी लोग थे। 1772 में कंपनी ने दोहरी शासन व्यवस्था समाप्त कर दी और बंगाल का शासन अपने हाथ में लेकर अपने अधिकारी नियुक्त कर दिए।