भारत में ब्रिटिश साम्राज्य: आर्थिक नीतियां और प्रशासनिक ढांचा (भाग-2)

     इस समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी जिसका ढांचा पूर्वी देशों से व्यापार के लिए बनाया गया था। इसके साथ ही इस का सर्वोच्च अधिकारी भारत से हजारों मील की दूरी पर इंग्लैंड में रहता था। इसके बावजूद करोड़ों लोगों के ऊपर इसमें राजनीतिक आधिपत्य कायम कर लिया था। इस असमान्य स्थिति के कारण ब्रिटिश सरकार के आगे समस्याएं खड़ी हो गई और उसके साम्राज्य का ब्रिटेन में बैठे कंपनी के अधिकारीगण हजारों मील दूर से किस तरह नियंत्रण करें। भारत में स्थित अधिकारियों और सैनिकों की विशाल संख्या पर किस प्रकार अंकुश रखा जाए? बंगाल, मद्रास और मुंबई में बिखरे हुए कंपनी के अधिकार-क्षेत्रओं के लिए भारत में एक ही नियंत्रण केंद्र किस प्रकार स्थापित किया जाए। 

     इनमें से पहली समस्या सबसे विकट और सबसे बड़ी महत्वपूर्ण थी। इसके अलावा यह समस्या ब्रिटेन में जारी दलगत और संसदीय दांव-पेचों से अंग्रेज राजनेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और अंग्रेज व्यापारियों के लो लोग से भी घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई थी। बंगाल के भारी संसाधन कंपनी के हाथों में आ गए थे। उसके मालिकों ने फौरन ही लाभांश की दर बढ़ाकर 1767 में 10% कर दी थी। 1771 में उन्होंने इसे और भी बढ़ाकर 12.50% करने का प्रस्ताव रखा था। कंपनी के अंग्रेज सेवकों ने अपनी स्थित का लाभ उठाकर गैरकानूनी और आसमान व्यापार तथा भारतीय शासकों और जमींदारों से जबरदस्ती रिश्वत और तोहफे वसूल करके तेजी से धन कमाया था। क्लाइव जब 34 वर्ष की आयु में इंग्लैंड लौटा तो उसके पास इतनी संपत्ति थी कि उसे प्रतिवर्ष 40 हजार पॉन्ड की आय हो सके।

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