धारा 3 का शीर्षक है – निर्देशों का अर्थ लगाना (Construction of references)। यह धारा मजिस्ट्रेट पद के अर्थान्वयन के विस्तृत नियम प्रस्तुत करती है। इस धारा में वर्णित उपबंधों के अनुसार जब तक अन्यता अभिप्रेत न हो, तब तक ‘मजिस्ट्रेट’ शब्द के अन्तर्गत उन्हीं को निर्देशित रूप में अर्थान्वयित किया जाएगा जो कि धारा में वर्णित है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट संबंधी प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 29 से 23 में पृथक से उपबन्धित है।
धारा 4 का शीर्षक है – भारतीय दण्ड संहिता और अन्य विधियों के अधीन अपराधों का विचारण्। इसके अनुसार – भारतीय दण्ड संहिता, 1860 के अधीन सब अपराधों का अन्वेषण, जाँच, विचारण और उनके सम्बन्ध में अन्य कार्यवाही इसमें इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट अपबन्धों के अनुसार की जाएगी।
- इस धारा में भारतीय दण्ड संहिता तथा अन्य विधियों ए अधीन अपराधों का विचारण के बारे में विशेष नियम अधिनियमित किये गये हैं। इस संदर्भ मे प्रस्तुत धारा में दो तरह की व्यवस्था है –
- यह कि भारतीय दण्ड संहिता के अधीन समस्त अपराधों का अन्वेषण, जांच, विचारण और उसके सम्बंध में अन्य सभिउइ कार्यवाही इसी संहिता में इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट उपबंधों के अनुसार की जाएगी।
- यह की किसी अन्य विधि के अधीन समस्त अपराधों का अन्वेषण, जांच व विचारण और उनके संबंध में अन्य कार्यवाही इन्ही उपबंधों के अनुसार की जाएगी किन्तु ऐसे अपराधों के अन्वेषण, जांच या विचारण या अन्य कार्ववाही की रीति या स्थान का विनियमन करने वाली तत्समय प्रवृत्त किसी अधिनियम के अधीन रहते हुए की जाएगी।
- Note 1: दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में कई बार संशोधन किये गये, यथा -1978, 1980, 1983, 1988, 1990, 1993, 2005, 2006, 2013 आदि के संशोधन।
- Note 2 : दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1993 द्वारा संहिता में एक नया अध्याय 7A जोड़ा गया, जिसका शीर्षक है – कुछ मामलों में सहायता के लिए व्यतिकारी व्यवस्था तथा सम्पत्ति की कुर्की और समपहरण के लिए प्रक्रिया (Reciprocal Arrangements In Certain Matters And Procedure for Attachment And Forfeiture of Property)।
- Note 3 : दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2005 (2006 के क्रमांक 2) की धारा 4 द्वारा एक नया अध्याय 21 (A) जोड़ा गया, जिसका शीर्षक है – ‘अभिवाक् सौदेबाजी (Plea bargaining)|
- संहिता में विचारण (Trail) शब्द की परिभाषा नहीं दी गई है। सामान्यतः विचारण से अभिप्राय उन सभी कार्यवाहियों से है। जिनमें किसी अपराधी को दोषसिध्द उआ दोषमुक्त करने के लिए न्यायालय सशक्त हो।