दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 : परिवाद के लक्षण

परिवाद के लक्षण

  1. परिवाद मौखिक अथवा लिखित किसी भी रूप में हो सकता है।
  2. परिवाद मजिस्ट्रेट के समक्ष किया जाता है न कि पुलिस अधिकारी के समक्ष।
  3. किसी भी शिकायत को तब तक परिवाद नहीं माना जाता है जब तक कि वह ऐसा कोई अपराध गठित नहीं करता हो जो विधि द्वारा दण्डनीय हो।
  4. परिवाद का मुख्य उद्देश्य उस मजिस्ट्रेट द्वारा कार्यवाही किया जाना है जिसके समक्ष वह प्रस्तुत किया गया है।
  5. पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट को परिवाद नहीं माना जाता है इसे परिवाद उसी अवस्था में माना जा सकता है जबकि वह अन्वेषण के पश्चात् असंज्ञेय अपराध होना प्रकट करती हो।
  • भारतीय संविधान के अध्याय-चार में राज्य की नीति के निदेशक सिध्दान्त के अन्तर्गत कार्यपालिका और न्यायपालिका को पृथक करने की नीति का उल्लेख किया गया है। इस नीति को कार्यन्वित करने के उद्देश्य से वर्तमान दण्ड प्रक्रिया संहिता में दो प्रकार के न्यायालयों की व्यवस्था की गई है- न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय एवं कार्यपालक मजिस्ट्रेट के न्यायालय।
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