भारत में ब्रिटिश साम्राज्य: आर्थिक नीतियां और प्रशासनिक ढांचा (1757 से 1857) - (भाग-3)

      कंपनी द्वारा दिए जा रहे लाभांश की उचित दरों और उसके अधिकारियों द्वारा भारी संपत्ति लेकर स्वदेश लौटने ब्रिटिश समाज के दूसरे वर्गों में ईर्ष्या की आग भड़का दी  कंपनी के एकाधिकार के कारण पूर्व के साथ व्यापार ना कर पा रहे व्यापारी, उद्योगपतियों का उभरता वर्ग तथा आमतौर पर ब्रिटेन में मुक्त उद्यम की उभरती शक्तियां सभी उस लाभकारी भारतीय व्यापार और भारत की विशाल संपत्ति में हिस्सा चाहते थे जिसका अभी तक कंपनी और उसके सेवक ही उपयोग कर रहे थे। इसलिए इस व्यापार पर कंपनी के एकाधिकार को तोड़ने के लिए जी तोड़ कोशिश की गई और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने बंगाल में कंपनी के शासन पर हमला किया। उन्होंने भारत से ब्रिटेन लौटने वाले कंपनी के अधिकारियों को अपना खास निशाना बनाया।

        इन अधिकारियों को "नवाब" कहकर प्रेस और मंच पर उनका मजाक उड़ाया जाता था। अभिजात वर्ग ने उनका बहिष्कार किया और भारतीय जनता का शोषण और उत्पीड़क कहकर उनकी निंदा की। उनके निशाने पर कंपनी के दो खास व्यक्ति खास व्यक्ति "क्लाइव" और "वारेन हेस्टिंग्स" थे कंपनी के विरोधियों को आशा थी की "नवाबों" की निंदा करके वे कंपनी को अलोकप्रिय बना सकेंगे और फिर उसपर अपना अधिकार जमा सकेंगे।

      अनेक मंत्री और संसद के दूसरे सदस्य भी बंगाल की संपत्ति से लाभ उठाने के लिए उत्सुक थे। उन्होंने जन समर्थन पाने के लिए कंपनी को मजबूर किया कि वह ब्रिटिश सरकार को खिराज दे ताकि भारत से प्राप्त राजस्व के सारे इंग्लैंड में टैक्सों या सार्वजनिक ऋणों का बोझ कम किया जा सके।

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