सोवियत संघ द्वारा 14 सितंबर 1949 में लूना- 2 नामक स्पेसक्राफ्ट ने चंद्रमा की सतह पर अपना कदम रखा था ।
इससे पहले चंद्रमा के अन्वेषण का एकमात्र साधन पृथ्वी से अवलोकन था।ऑप्टिकल दूरबीन के आविष्कार ने चंद्रमा के अवलोकन करने की गुणवत्ता में पहली सफलता पाई गयी।
गैलीलियो प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने दूरबीन का प्रयोग खगोलीय अनुसंधान के लिए किया तथा उन्होंने 1609 में एक शक्तिशाली दूरबीन स्वयं बना ली थी।
मनुष्य की चांद पर प्रथम सफल लैंडिंग नासा द्वारा 1969 में चलाए गए अपोलो कार्यक्रम के तहत हुई थी।इसके द्वारा अंतरिक्ष यात्री वैज्ञानिक उपकरणों को वहां स्थापित करने के साथ-साथ चंद्रमा के नमूनों को लेकर पृथ्वी पर लौटे थे।
शीत युद्ध में सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य अंतरिक्ष और चंद्रमा को लेकर प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा दिया।
इंसान का बनाया पहला मानवरहित सोवियत स्पेसक्राफ्ट लूना-२ 14 सितंबर 1949 को चांद की जमीन पर उतरा था।
मानव द्वारा चंद्रमा पर पहला कदम 20 जुलाई 1969 में रखा गया अमेरिकी मिशन अपोलो- 11 के कमांडर अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने चंद्रमा पर कदम रखा।
लूनाखोद कार्यक्रम के तहत 17 नवंबर 1970 में चंद्रमा की सतह पर सोवियत संघ द्वारा लूनाखोद-1 नामक चांदी गाड़ी उतारी गई।
अपोलो 17 मिशन के सदस्य यूजीन केरनन ऐसे आखिरी व्यक्ति थे जिन्होंने दिसंबर 1972 में चंद्रमा पर चहलकदमी की थी।
पिछले एक दशक में भारत और चीन की सरकारों व निजी उद्यमों ने एक बार फिर चंद्रमा पर ध्यान आकर्षित किया है जबकि आने वाले वर्षों में जापान और दक्षिण कोरिया इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं ।इस प्रयास में 2017 से 2020 के बीच करीब 10 मिशन चंद्रमा पर भेजने की तैयारी चल रही है जबकि आने वाले 10 वर्षों में वहां विमान भेजने का प्रयास जारी है जो मानव युक्त हों।