सभी अंतरिक्ष मिशन चुनौतीपूर्ण होते है लेकिन लैंडिंग मिशन विशेष रूप से जटिल होते हैं।
1950 के दशक के उत्तरार्ध में कुछ देशों ने ही चंद्रमा के लिए करीब 50 मिशन जिसमें कुछ इस उपग्रह को जानने के लिए कुछ इसकी जमीन पर उतर कर उसका मुआइना करने के लिए भेजें जिसमें शुरुआत में आधे ही प्रयास सफल हुए थे अमेरिका एकमात्र ऐसा देश था जिसके अंतरिक्ष यात्री 1969 में अपोलो -11 की सहायता से चंद्रमा पर उतरे थे।
इनका इरादा 2 साल की अवधि में चंद्रमा के सतह कि रासायनिक विशेषता, त्रिआयामी स्थलाकृति का पूरा नक्शा आदि का सर्वेक्षण करना था। चंद्र मिशन के तहत इसरो के पांच तथा विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों की 6 के पेलोडों को निशुल्क ले जाया गया।इन विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों में NASA,ESA तथा बुलगारियन अंतरिक्ष एजेंसी के पेलोड शामिल थे। इसने चंद्रमा की सतह पर पानी के कणों की मौजूदगी के पुख्ता संकेत दिए थे। चंद्रयान ने चांद पर पानी की मौजूदगी का पता लगाकर इस सदी की महत्वपूर्ण खोज की थी।
सन 2008-09 में इसरो ने चंद्रमा पर अपना पहला मिशन चंद्रयान -1 के नाम से भेजा जो अपने प्रथम वर्ष में 3 महीने लापता हो गया था परंतु विश्व समुदाय द्वारा चंद्रमा पर पानी, बर्फ या हाइड्रोक्सिल की मौजूदगी का पता लगाने के लिए इसकी प्रशंसा की गई।
इसरो के केंद्रों में आधा दर्जन वैज्ञानिक उपकरण तथा पेलोड तैयार किए जा रहे हैं।यह चंद्रमा की सतह का स्कैन करके खनिज ,पानी या बर्फ और हाइड्रोक्सिल की विस्तृत जानकारी प्राप्त करेगा।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने 2021- 22 तक मंगल ग्रह पर एक लैंडर एवं उसके बाद शुक्र की कक्षा में परिक्रमा के लिए एक उपग्रह भेज सकता है। भारत सरकार ने इस रोग को इस दिशा में आगे प्रयत्न करने के लिए योजना बनाने को कहा है। सरकार ने 2017 के बजट प्रस्ताव में मंगल मिशन को हरी झंडी प्रदान की थी।फ्रांस के साथ प्रस्तावित इस दूसरे मंगल मिशन के लिए इसरो ने उन्नत स्तर के विज्ञान एवं तकनीकी के इस्तेमाल का भरोसा दिलाया है।