भारत में यूरोपियों का आगमन (भाग-2)

       भारत में यूरोपियों के आगमन की दिशा में पहला कदम पुर्तगाल और स्पेन ने उठाया। इन देशों के नागरिकों ने अपनी सरकारों की सहायता से और उनकी आज्ञा पर भौगोलिक खोजों का एक महान युग आरंभ किया। 1494 में स्पेन का कोलंबस भारत को खोजने निकला लेकिन वह अमेरिका की खोज कर बैठा। 1498 में पुर्तगाल के वास्कोडिगामा ने यूरोप से भारत का नया और पूरी तरह से समुद्री मार्ग ढूंढ निकाला। वह केप ऑफ गुड होप होते हुए अमेरिका का पूरा चक्कर लगाकर कालीकट पहुंचा। वह जिस माल को लेकर वापस लौटा वह पूरी यात्रा की कीमत के 60 गुना दामों पर बीका। ऐसे ही दूसरे समुद्री मार्ग की खोजो ने विश्व के इतिहास में एक नया अध्याय का सूत्रपात किया। 17वीं और 18 वीं सदी में विश्व व्यापार में बेहद बढ़ोतरी हुई। यूरोप को अब एक खूब लंबा चौड़ा अमेरिकी महाद्वीप उपलब्ध हो गया और यूरोप और एशिया के संबंध में पूरी तरह बदल गए।

         पंद्रहवीं सदी के मध्य में अफ्रीका में यूरोपीय देशों में प्रवेश किया तो उससे भी उनको आरंभिक पूंजी निर्माण का एक प्रमुख स्रोत प्राप्त हुआ। आरंभ में विदेशियों को अफ्रीकी सोने और हाथी दांत ने आकर्षित किया। परंतु बहुत जल्द ही गुलामों का व्यापार अफ्रीका के साथ व्यापार का प्रमुख भाग बन गया। 16वीं सदी में इस व्यापार पर स्पेन और पुर्तगाल का एकाधिकार रहा। बाद में  इस व्यापार में डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज व्यापारी भी छा गए।

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