भारतीय दण्ड संहिता : दुराशय (Mens Rea) - 01

दुराशय (Mens Rea)

  • ब्रिटिश कॉमन लॉ और भारतीय दण्ड संहिता में ‘दुराशय’ के सम्बन्ध में काफी विबिन्नताएं हैं।
  • ब्रिटिश कॉमन लॉ के अनुसार आपराधिक विधि के अन्तर्गत दुराशय निम्न महत्वपूर्ण सुक्तियों पर आधारित है –
    1. केवल कार्य किसी को अपराधी नहीं बनाता यदि उस्का मन अपराधी नहीं है।
    2. मेरे द्वारा मेरी इच्छा के विरुध्द किया गया कार्य मेरा नहीं है।
    3. दुराशय के अभाव में कोई भी कार्य चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा अपराध नहीं है।
  • भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत ब्रिटिश कॉमन लॉ में प्रचलित दुराशय का सिध्दांत सामान्यतः लागू नहीं होता है क्योंकि भारतीय दण्ड संहिता एक संहिताबध्द विधि है।
  • भारतीय दण्ड संहिता मे शब्द ‘दुराशय’ के स्थान पर शब्द ‘स्वेच्छा से’ ‘आशय से’ ‘जानबुझकर’ आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  • भारतीय दण्ड संहिता में कुछ कृत्य तथा उसके परिणाम ऐसे है जो पूरे समाज अथवा राज्य के लिए इतने हानिकारक होते है कि ऐसे कृत्य को कारित करने के आशय के अभाव में भी दण्ड दिया जाता है। अर्थात् इन कृत्यों में दुराशय का होना आवश्यक नहीं है, जैसे – भारत सरकार के विरुध्द युध्द करना, राजद्रोह, अपहरण आदि।
  • कुछ कृत्य जो समाज की सुरक्षा तथा स्वास्थ्य के लिए घातक होते है, दुराशय के बिना भी दण्डनीय अपराध हो सकते है, अर्थात् इन अपराधों के लिए अपराधी का दुराशय होना आवश्यक नहीं है। इस्का कारण यह है कि ऐसे अपराधों में विधि की यह धारणा रहति है कि उनमें आन्वयिक दुराशय (Constructive mens rea) विद्यमान रहता है जो अपराधी पर कठोर दायित्व अधिरोपित करता है।

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