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Sudhanshu Kumar Mishra
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भारतीय दण्ड संहिता : दुराशय (Mens Rea) - 02
क्रमशः ...
यदि किसी दूध बेचने वाले के दूध में कोई व्यक्ति उसकी जानकारी के बिना पानी मिला देता है जिसके परिणाम्स्वरुप उस दूध बेचने वाले के विरुध्द दूध में मिलावट के अपराध का अभियोजन चलाता है, तो आन्वयिक दुराशय के सिध्दांत के आधार पर उसे अपराधी माना जाएगा चाहे भले ही उस्का मिलावट करने का आशय न रहा हो या उसे इसकी जानकारी न रही हो।
“राम प्रकाश बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य”
Al.IR. 1973 SC 780]
यदि उपर्युक्त दृष्टांत में दूध बेचने वाला व्यक्ति अपने मालिक की ओर से दूध बेचता है और मालिक ने दूध में मिलावट की है जिसकी जानकारी उस नौकर को नहीं है, तो उस दशा में नौकर आन्वयिक दुराशय के अधीन अपराधी नहीं माना जाएगा अपितु इसका दोष मालिक पर होगा।
अपराध के लिए यह भी आवश्यक है कि अपराधी आपराधिक कार्य करने में सक्षम होना चाहिए। उदाहरणार्थ किसी हिजड़े पर बलात्संग का आरोप लगाना व्यर्थ होगा क्योंकि वह इस कृत्य को कर ही नही सकता। इसी प्रकार यदि किसी नपुंसक व्यक्ति के विरुध्द बलात्संग के अपराध का आरोप लगाना व्यर्थ है होगा क्योंकि इसके लिए वह अक्षम है। यही कारण है कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 82 के अन्तर्गत सात वर्ष से कम आयु के बच्चे आपराधिक दायित्व से मुक्त रखे गए है।
आपराधिक मामले में सबूत का भार अभियोजन पक्ष, अर्थात् राज्य पर रहता है। अभियुक्त को तब तक निर्दोष समझा जाता है जब तक उसे दोषी साबित न कर दिया जाये।
Sudhanshu Mishra
Medium-Hindi
Indian Penal Code (IPC)
Law
PCS (J)
APO
ADPO
Civil Judge
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