क्रमशः..
Day - 31
- भारत के संविधान में नम्यता अथा अनम्यता के लक्षण एक साथ विद्यमान हैं। यह संविधान इसलिए नम्य है कि इसके अधिकतर प्रावधानों को संसद द्वारा साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है जबकि कुछ प्रवधानों को शंशोधित करना अत्यन्त कठिन और उसके लिए विशेष प्रक्रिया अंगीकृत की जाती है।
- वैसे तो सामान्यतः भारत का संविधान संघात्मक है लेकिन विशेष परिस्थितियों में, जैसे – आपातकाल की स्थिति में, भारत का संविधान एकात्मक हो जाता है और केन्द्राभिमुख हो जाता है।
- सामान्यतः संघीय संविधान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान होता है – एक संघ की तथा दूसरी राज्य की। लेकिन भारतीय संविधान इसका अपवाद है। भारतीय संविधान, संघीय संविधान होते हुए भी एकल नागरिकता का प्रावधान करता है।
- भारतीय संविधान के निर्माण के लिए गठित ‘संविधान सभा’ ने कई देशों के संविधान का अध्ययन किया था और विभिन्न देशों की शासन प्रणालियों की विशेषता तथा गुण एवं दोषों से परिचित थे। भारतीय संविधान के निर्माण के समय लगभग 60 देशों के संविधान के मुख्य तत्वों को संविधान में शामिल किया गया था।
- भारत का संविधान ‘शक्ति के पृथक्करण के सिध्दान्त’ का पालन करती है। शक्ति पृथक्करण का अर्थ होता है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका की शक्ति अलग-अलग रखी जाये अर्थात् तीनों शक्तियाँ एक ही जगह केन्द्रीभूत न हो।
- संसद या राज्य विधान मण्डलों द्वारा निर्मित यदि कोई विधि संविधान के उपबन्धों के विपरीत है तो उच्चतम् न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है और वह विधि प्रभावी नहीं रह सकती। न्यायालय की इस शक्ति को ‘न्यायिक पुनर्विलोकन’ कहते हैं।
जारी...
मिलते है हम अगले दिन, इसी विषय पर फिर चर्चा करने के लिये..