भारतीय संस्कृति जीवन के समान ही बहुआयामी है। इसमें मनुष्य के सामाजिक और बौद्धिक पक्ष सम्मिलित होते हैं। यह मनुष्य की आध्यात्मिक तथा सौंदर्यात्मक भावनाओं को भी दर्शाती है।वस्तुतः चरित्र का निर्माण करने वाली शक्ति के रूप में इस में चेतना के प्रति प्रेरणा भी निहित है।
भारत एक विशाल देश है जो स्वयं में भौतिक और सामाजिक वातावरण की अनेक विविधता को समाहित किए हुए हैं। हम अपने आसपास विभिन्न भाषाओं में बात करने वाले, विभिन्न धर्मों और रीति रिवाजों को मानने वाले लोगों को देखते हैं। यही विविधता उनके खान-पान तथा पहनावे में भी देखी जा सकती है लेकिन इन सभी विविधताओं के साथ इन सब में एक एकात्मकता भी है जो इनको एक साथ जोड़ने का काम करती है। भारत में सदियों से लोगों का मेल मिलाप होता रहा है। भिन्न-भिन्न जातीय व नृजातीय पृष्ठभूमि तथा विभिन्न धर्मों पर आस्था रखने वाले काफी लोग यहां आकर बसे हैं।भारतीय संस्कृति का विविध हुआ बहुआयामी चरित्र एक लंबी अवधि के दौरान सभी विविध सांस्कृतिक समूहों के संश्लेषण का ही देन है।
संसार के विभिन्न देशों और क्षेत्रों में अनेक महान संस्कृतियों का विकास हुआ।इनमें से बहुत से लुप्त हो गई या उनका स्थान आना संस्कृतियों ने ले लिया। परंतु भारतीय संस्कृत में सहनशीलता का गुण रहा है।कुछ बड़े बदलाव और उथल-पुथल के बावजूद भारतीय इतिहास की धारा में शुरुआत से लेकर आज तक निरंतरता की एक कड़ी देखी जा सकती है।
हड़प्पा की सभ्यता जो भारतीय महाद्वीप में फली फूली और लगभग 4500 साल से भी पुरानी है । पुरातत्वविदों को यहां हड़प्पा सभ्यता से भी पहले की संस्कृति होने के प्रमाण मिले हैं। यह प्रमाण हमें बताते हैं कि हमारा इतिहास अतिप्राचीन है।इसके बावजूद आश्चर्यजनक बात यह है कि आज भी भारतवर्ष के गांवों के मकानों की बनावट हड़प्पा के समय के मकानों से बहुत ज्यादा भिन्न नहीं है।