भारतीय संस्कृति की विशेषताएं और मूलभूत लक्षण-2

हड़प्पा कालीन संस्कृति की कुछ प्रथाएं आज भी प्रचलित है जैसे मार्त देवी और पशुपति की उपासना। वैदिक, बौद्ध और जैन धर्म तथा अन्य धर्मों की परंपराएं आज भी प्रचलित है ।
निरंतरता बनाए रखने के साथ-साथ परिवर्तन भारतीय संस्कृत की विशिष्टता रही है जहां एक और संस्कृत के दर्शन की मूल भावना निरंतर रही है वहीं संस्कृति उन तत्वों को लगातार बदलती रही है जो आधुनिक युग के अनुरूप नहीं रहे हैं। प्राचीन इतिहास में कई उतार-चढ़ाव आए जिसके परिणाम स्वरूप कई आंदोलन विकसित हुए और बदलाव लाए गए।छठी शताब्दी ईसा पूर्व में जैन और बौद्ध धर्म द्वारा वैदिक धर्म में परिवर्तन तथा आधुनिक भारत में 18 और 19 वीं शताब्दी में हुआ नवजागरण ऐसे उदाहरण हैं जिनके द्वारा भारतीय चिंतन और व्यवहार में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन हुए।
भारतीय संस्कृति का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप भिन्न सांस्कृतिक समूहों का एक लंबे समय से परस्पर घुलमिल जाने का परिणाम है। यहां आपस में संघर्षों के भी कई उदाहरण हैं लेकिन सामान्यता लोग यहां शताब्दियों से शांतिपूर्वक आपस में मिल जुल कर रहते आ रहे हैं। भारत की लोकप्रिय सांस्कृतिक परंपराएं इस मिश्रित या साझी संस्कृति के सबसे अच्छे उदाहरण हैं, जिसमें काफी संख्या में भिन्न-भिन्न धर्म के लोग आपस में मिल जुल कर रहते हैं। हमारे देश में विचारों और आ चरणों में बहुत ज्यादा विविधताएं मौजूद है। ऐसी विविधताओं के बीच में किसी एक विशेष विचार का प्रभुत्व संभव नहीं है। भारत में हिंदू मुस्लिम ईसाई सिख बौद्ध जैन पारसी और यहूदी सभी रहते हैं। और यह सभी धर्मों को समान नजरों से देखता है। धर्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है।जनमानस ने भी काफी हद तक एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित किया है और वह जियो और जीने दो की अवधारणा पर विश्वास करता है। धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार हमारे गणतंत्र की धर्मनिरपेक्षता को दर्शाता है।पश्चिमी संदर्भों में धर्मनिरपेक्षता के विकास का मतलब धर्म और राज्य सत्ता का पूर्ण रूप से अलगाव होता है।भारत में धर्मनिरपेक्षता को एक सकारात्मक अवधारणा के रूप में लिया जाता है जो सभी लोगों के अधिकारों विशेषता अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा तथा भारत की जटिल सामाजिक संरचना के हिसाब से उपयुक्त होता है।
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