भारतीय दण्ड संहिता : तैयारी एवं प्रयत्न में अन्तर

तैयारी एवं प्रयत्न में अन्तर

तैयारी एवं प्रयत्न में अन्तर किया जाना एक कठिन कार्य है। किन्तु इन रि बावजै(AIR 1950 Madras 44) के वाद में माननीय न्यायमूर्ति गोविन्द मेननने यह मत व्यक्त किया कि किसी अपराध को कारित किये जाने के लिए किए गए कार्य को तैयारी माना जाय या प्रयत्न, इस बात का अवधारणा प्रत्येक मामले के तथ्य के आधार पर किया जाता है। फिर भी इन दोनों में अन्तर की एक सूक्ष्म रेखा खींची जा सकती है –

  1. किसी अपराध को कारित लिए जाने के लिए साधनों को एकत्रित करना तैयारी होता है जबकि अपराध करने की चेष्टा करना प्रयत्न माना जाता है।
  2. तैयारी करना मात्र अपने-आप में कोई अपराध नहीं होता जबकि प्रयत्न करना अपराध माना जाता है क्योंकि प्रयत्न करना आपराधिक आशय का साक्ष्य है।
  3. संहिता में अपराध करने की तैयारी को दण्डनीय अपराध नहीं माना गया है जबकि संहिता में अपराध करने के प्रयत्न को दण्डनीय माना गया है।
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