क्रमशः ....
अपराध की पूर्णता
- अपराध की पूर्णता अपराध गठित करने का अन्तिम चरण होता है और इसमें कार्य पूर्ण हो जाता है।
- भारतीय दंड संहिता में अपराध की पूर्णता को दंडनीय बनाया गया है परन्तु इसका एक अपवाद आत्महत्या की पूर्णता है। आत्महत्या की पूर्णता वाले व्यक्ति दण्डित नहीं किया जा सकता क्योंकि अब वह जीवित नहीं रह जाता।
- अपराध के उपर्युक्त चार चरणों को निम्न उदाहरण से और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है –
किसी कम्पनी के एक कर्मचारी के मन में कम्पनी के माल को गबन कर विक्रय से धन कमाने की लालसा जागृत होति है और वह ऐसा करने का इरादा (आशय) रखता है। यह उसके अपराध का प्रथम चरण है जिसे अपराध नही माना जायेगा।
अब वह कर्मचारी उस माल को कम्पनी से निकालने के लिए चौकीदार से सहायता हेतु वार्तालाप करता है। यह उस अपराध की तैयारी है, जो स्वयंमेव दण्डनीय नहीं है।
तत्पश्चात् वह कर्मचारी चौकीदार की मदद से उस माल को कम्पनी के स्थल से बाहर निकाल ले जाता है और अन्यत्र बेचने ले जाता है लेकिन चुंगी नाके पर पकड़ा जाता है। यह अपराध करने का प्रयास होने के कारण अपराधी माना जाएगा तथा उसे दण्डित किया जा सकेगा।
यदि अपराधी चुंगी नाके पर पकड़ा न जाता और माल को नियोजित स्थान पर ले जा कर बेच देता तो यह अपराध का अंतिम चरण कहलायेगा क्योंकि उसने अपराध कृत्य को पूर्णतः निष्पादित या कार्यनन्वित कर दिया है।
अतः अपराध पूर्ण हो जाने के बाद उसे दण्डित किया जा सकेगा।
आगे और भी है ....