e-Note भारतीय दण्ड संहिता : अपराध के विभिन्न चरण - 04

क्रमशः ....

आपराधिक मनःस्थिति का सिध्दांत

  • आपराधिक मनःस्थिति का सिध्दांत उपेक्षापूर्ण कार्य व विद्वेषपूर्ण कार्य पर लागू होते हैं किन्तु यह सिध्दांत कठोर दायित्व के मामले में नहीं लागू होता है।
  • आपराधिक मनःस्थिति प्रत्येक अपराध में आवश्यक तत्व होता है किन्तु उसके निम्नलिखित अपवाद भी हैं –
    1. उन मामलों में जो वास्तव में अपराध न हो।
    2. लोक उपताप (Public nuisance) के मामले में।
    3. वे मामले जो आपराधिक न हो किन्तु नागरिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए वास्तव में संक्षिप्त बनाये गये हो।

अपराध में शारीरिक भागीदारी न होना / अप्रत्यक्ष होना

  • कोई व्यक्ति अपराध के लिए पूर्णरूपेण दायी होता है यद्यपि कि वह अपराध करने में शारीरिक रूप से थोड़ा भी भाग लिया हो। उदाहरणार्थ, दिल्ली का कोई व्यक्ति त्रिवेन्द्रम में अपराध को दुष्प्रेरित करने या अपराध के लिए व्यवस्था करने के लिए दायी हो सकता हैं। ऐसी स्थितियों से सम्बन्धित कानून षडयंत्र, दुष्प्रेरण और उद्दीपन के अधीन आता है।
  • कोई व्यक्ति अपराध के लिए पूर्णरुय्पेण दायी होता है यदि वह किसी निर्दोष व्यक्ति को अपराध कारित करने में प्रयुक्त किया है। उदाहरणार्थ, जहाँ ‘अ’ चुपके से एक पेय पदार्थ में जहर मिला देता है जिसे वह जानता है कि ‘ब', ‘स’ को पीने के लिए देगा।

आगे और भी है .... 

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