e-Note भारतीय दण्ड संहिता : अपराध के विभिन्न चरण - 05

क्रमशः ....

कठोर दायित्व

  • आधुनिक समय में कठोर दायित्व या पूर्ण दायित्व का सिध्दांत लोकोपकारी अपराधों में अधिक दृष्टिगत होता है। ये अपराध अपमिश्रित दवाइयों तथा भोज्य पदार्थों के विक्रय, या कब्जा से सम्बन्धित अपराध या सड़क यातायात से सम्बन्धित हैं।
  • कॉमन लॉ में मनः स्थिति के सिध्दांत के तीन मान्यता प्राप्त अपराध हैं, यथा –
    1. लोक उपताप (Public Nuisance)
    2. आपराधिक अपलेख (Criminal Libel)
    3. न्यायालय की मानहानि (Contempt of Court)

प्रतिनिहित दायित्व (Vicarious Liability)

  • सामान्य रूप में किसी अपराध को गठित करने के लिए दोषी मस्तिष्क का होना आवश्यक है। परन्तु कुछ ऐसे भी अपराध हैं जिनमें अभियुक्त की तरफ से किसी प्रकार के विधिक दोष की आवश्यकता नहीं पड़ती। ऐसे अपराध जिनमें अभियुक्त के दोष की आवश्यकता नहीं पड़ती बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के दोष की आवश्यकता पड़ती है, प्रतिनिहित दायित्व के अपराध कहे जाते है। ये ऐसे अपराध होते हैं जिनमें दुराशय या उपेक्षा की आवश्यकता को पूर्णतः या आंशिक रूप में अपवर्जित कर दिया जाता है।
  • साधारणतया कोई भी व्यक्ति अपने ही कार्यों के लिए आपराधिक रूप में उत्तरदायी होता है और एक व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति के कृत्यों के लिए दण्डित नहीं किया जा सकता है। किन्तु आदिकाल से ही साधारण नियम के कुछ अपवाद माने गए हैं।
  • प्रतिनिहित दायित्व का सिध्दांत सर्वप्रथम ‘आर. बनाम हिगिन्स(1730) के वाद में प्रतिपादित किया गया था।

आगे और भी है .... 

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