भारत में यूरोपियों का आगमन (भाग-3)

     1650 के बाद अनेक वर्षों तक हजारों अफ्रीकीओं को गुलाम बनाकर वेस्टइंडीज और उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में बेचा जाता रहा। कारखानों का माल लेकर गुलामों को व्यापार करने वाले जहाज यूरोप से अफ्रीका पहुंचते, अफ़्रीका के तटों पर नीग्रो  लोगों से माल की अदला बदली करके फिर इन दासों को लेकर अटलांटिक पार करते, वहां बागानों और खाद्यान्नों की औपनिवेशिक पैदावार से उनकी अदला-बदली करते,  और फिर इस माल को यूरोप में बेच देते। तिकोने व्यापार से होने वाला यही बेपनाह मुनाफा था जिस पर इंग्लैंड और फ्रांस की व्यापारिक श्रेष्ठता स्थापित हुई।

       पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका की समृद्धि अधिकांशत गुलामों के इसी व्यापार पर और दासों की मेहनत से चलने वाले बागानों पर निर्भर थी। इसके अलावा दास व्यापार और दासों की मेहनत से चल रहे बागानों के मुनाफे से ही वह पूंजी बनी जो 18वीं और 19 वीं सदी की औद्योगिक क्रांति में काम आई बाद में भारत से ले जाई गई दौलत ने भी ऐसी ही भूमिका निभाई।

      16वीं सदी में यूरोप के व्यापारियों और सैनिकों ने एशियाई देशों में घुसने और फिर उनको अधीन बनाने का लंबा सिलसिला शुरू कर दिया। बेहद मुनाफा देने वाले पूर्वी व्यापार पर लगभग एक सदी तक पुर्तगाल का एकाधिकार  रहा।

       भारत में भी पुर्तगाल ने कोचीन, गोवा, दमन और दीव में अपने व्यापारिक केंद्र खोले। पुर्तगालियों ने आरंभ से ही व्यापार के साथ शक्ति का भी प्रयोग किया। इस काम में उन्हें समुद्र पर राज करने वाले हथियारबंद जहाजों की श्रेष्ठता से मदद मिली। जमीन पर भारत और एशिया के सैनिक शक्ति बहुत ही अधिक थी, मगर उनके मुकाबले मुट्ठी भर पुर्तगाली सैनिक और जहाजी समुद्र में अपनी स्थिति बनाए रखने में सफल रहे। मुगलों की जहाजरानी के लिए खतरे पैदा करके वह मुगल सम्राटों से भी अनेक व्यापार संबंधी छूट लेने में सफल रहे।

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