उच्च न्यायालय के अधिकार एवं कार्य-- क्षेत्र

जिस राज्य में उच्च न्यायालय होता है प्रायः वह पूर्ण राज्य उस राज्य न्यायालय के न्यायिक अधिकार क्षेत्र में आ जाता है किंतु यदि संसद चाहे तो समीपवर्ती राज्य को भी किसी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में जोड़ सकती है। भारतीय संघ के प्रत्येक उच्च न्यायालय को दो प्रकार की शक्तियाँ या अधिकार प्राप्त है। 

1. प्रशासन संबंधी और 2. न्याय संबंधी।

न्यायसंबंधी अधिकारों को दो और भागों में बांटा जा सकता है----

a. प्रारंभिक क्षेत्राधिकार तथा अपीलीय क्षेत्राधिकार।

उच्च न्यायालय कौन मुख्य शक्तियां या अधिकार प्राप्त है-

*प्रारंभिक क्षेत्राधिकार--- उच्च न्यायालय में दीवानी और फौजदारी के कुछ विशेष कोर्ट के मुकदमे सीधे प्रस्तुत किए जा सकते हैं प्रारंभिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत उच्च न्यायालय को नसीहत, विवाह -विच्छेद, विवाह विधि, कंपनी कानून, उच्च न्यायालय की अवमानना इत्यादि से संबंधित मुकदमे सुनने का अधिकार है। मूल अधिकारों की रक्षा एवं संविधान की व्याख्या संबंधी विवाद भी उच्च न्यायालय मैं सीधे प्रस्तुत होते हैं।

*मूल अधिकारों का रक्षक-- संविधान द्वारा प्रदान किए गए नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा सभी उच्च न्यायालय करते हैं। मूल अधिकारों की रक्षा के लिए प्रत्येक उच्च न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश ,प्रतिषेध , अधिकार पृच्छा ,  उत्प्रेषण लेख जारी कर सकता है। यह लेख मूल अधिकारों की रक्षा के अतिरिक्त अन्य विवादों के संबंधों में भी जारी किए जा सकते हैं।

* अपीलीय क्षेत्राधिकार --- उच्च न्यायालय प्रधानता अपील का न्यायालय हैं इसमें अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील की जाती है। फौजदारी तथा दीवानी दोनों ही प्रकार की अपील है उच्च न्यायालय में सुनी जा सकती है। इसमें सत्र न्यायाधीश के निर्णय के विरुद्ध फौजदारी की तथा जिला न्यायाधीश एवं व्यवहारिक न्यायाधीश के निर्णय के विरुद्ध दीवानी की अपील भी होती है।

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