1773 का रेगुलेटिंग एक्ट
1773 का रेगुलेटिंग एक्ट कंपनी की गतिविधियों से संबंधित पहला महत्वपूर्ण संसदीय कानून था। इस कानूूून के कारण कंपनी के कोर्ट आफ डायरेक्टर्स के गठन में परिवर्तन हुआ तथा उनकी गतिविधियां ब्रिटिश सरकार की निगरानी में आ गई। पर रेगुलेटिंग एक्ट व्यवहार में जल्दी ही बेकार सिद्ध हुआ। इसके कारण ब्रिटिश सरकार को कंपनी पर प्रभावी और निर्णायक नियंत्रण नहीं मिल सका। यह कानून कंपनी और उसके शक्तिशाली और मुखर होकर जा रहे विरोधियों के झगड़े को भी नहीं सुलझा सका। इसके अलावा कंपनी अपने शत्रुओं के हमलों का निशाना बनी रही क्योंकि उसके भारतीय अधिकार क्षेत्र का प्रशासन भ्रष्ट, दमनकारी और आर्थिक दृष्टि से विनाशकारी ही बना रहा।
रेगुलेटिंग एक्ट के दोषों तथा ब्रिटिश राजनीति के उतार-चढ़ाव के कारण 1784 में एक और कानून बनाना पड़ा जिसे पिट्स इंडिया एक्ट कहा गया। इस कानून के बल पर ब्रिटिश सरकार का कंपनी के मामलों तथा उसके भारतीय प्रशासन पर पूरा नियंत्रण स्थापित हो गया। भारतीय मामलों की देखरेख के लिए 6 कमिश्नर नियुक्त किए। जीिसे बोर्ड ऑफ कंट्रोल कहा गया। जिसमें दो कैबिनेट मंत्री भी शामिल होते थे। बोर्ड आफ डायरेक्टर्स और भारत सरकार के कार्यों का मार्गदर्शन और संचालन इसी बोर्ड ऑफ कंट्रोल को करना था। इस कानून ने भारत के शासन को गवर्नर जनरल तथा 3 सदस्यों वाली एक काउंसिल के हाथों में दे दिया ताकि अगर एक सदस्य का समर्थन भी गवर्नर जनरल को प्राप्त हो तो वह अपनी बात मनवा सके। इस कानून में मुंबई और मद्रास प्रेसिडेंसीयों को युद्ध, कूटनीति और राजस्व के मामलों में स्पष्ट शब्दों में बंगाल के अधीन कर दिया और इसी कानून के साथ ही भारत में ब्रिटिश विजय का एक नया युग प्रारंभ हो गया।