इस प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटेन की राष्ट्रीय नीति का एक साधन बन गई। अब भारत का शासन इस प्रकार चलाया जाना था कि उससे ब्रिटेन के शासक वर्गों के सभी भागों के हित पूरी हो सके। भारत और चीन के साथ व्यापार पर अपना एकाधिकार सुरक्षित पाकर कंपनी भी संतुष्ट हो गई। भारत में ब्रिटिश अधिकारियों को नियुक्त करने तथा सेवा मुक्त करने का लाभदाई अधिकार डायरेक्टर के हाथों में बना रहा। इसके अलावा भारत की सरकार को भी उन्हीं के माध्यम से चलाया जाने की व्यवस्था थी।
पिट्स इंडिया एक्ट ने यह सामान्य ढांचा तो निर्धारित कर दिया जिसमें भारत की सरकार 1857 तक चलाई गई, पर बाद में कानूनों में अनेक ऐसे महत्वपूर्ण परिवर्तन किए जिससे कंपनी की शक्तियों और विशेषाधिकारों में धीरे-धीरे कमी आई। 1776 मैं गवर्नर जनरल को यह अधिकारदे दिया गया कि वह भारतीय साम्राज्य की शांति, सुरक्षा या उसके हितों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण प्रश्नों पर अपनी काउंसिल की रायको ठुकरा सके।
1813 के चार्टर एक्ट के अनुसार भारतीय व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार समाप्त हो गया और सभी ब्रिटिश नागरिकों को भारत के साथ व्यापार करने की छूट दे दी गई। पर चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार बना रहा। भारत की सरकार तथा उसका राजस्व भी कंपनी के हाथों में ही बने रहे। भारत में अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार भी कंपनी भी के पास ही रहा।